मऊ के लाल : विश्व विख्यात हैं आरएन सिंह 

28 Mar 2022

---बुलंद आवाज विशेष-----
-खेतिहर परिवार से निकलकर विजुअल आर्ट में कमाया नाम और दाम
-नई दिल्ली की प्रोगेसिव आर्ट गैलरी खोली, लंदन व दुबई में भी शोरुम
-छह सौ की नौकरी से शुरुआत, आज हर वर्ष 3 सौ करोड़ का कारोबार
-धूमिमल आर्ट गैलरी में कला और कलाकारों से हो गया अगाध लगाव
 

बृजेश यादव 
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मऊ :
अपने साप्ताहिक कालम मऊ के लाल में आज हम आपको परिचित कराने जा रहे हैं आरएन सिंह (रामनवल सिंह) से। विश्व विख्यात आर्टिस्ट कारोबारी आरएन सिंह गुदड़ी के लाल (साधारण घर में जन्मे असाधारण प्रतिभावान व्यक्ति) हैं। खेती-किसानी से जुड़े परिवार से नाता रखने वाले सिंह ने विजुअल आर्ट (दृश्य कला) के क्षेत्र में पूरी दुनिया में नाम व दाम दोनों कमाया है। नई दिल्ली में इनकी खुद की प्रोगेसिव आर्ट गैलरी है। इसकी दूसरी शाखा लंदन व तीसरी दुबई में संचालित है। साढ़े चार दशक पहले छह सौ रुपये प्रतिमाह की नौकरी करने वाले सिंह का आज तीन सौ करोड़ प्रतिवर्ष पेंटिंग्स का कारोबार है। दिल्ली की प्रतिष्ठित धूमिमल आर्ट्स गैलरी में 12 साल तक काम करते-करते इनका चित्रकला व कलाकारों से अगाध लगाव हो गया। खुद पेंटिग्स बनाना और देश-दुनिया के नामचीन चित्रकारों की पेंटिग्स खरीदकर बेचने को इन्होंने कारोबार बना लिया। आज के परिवेश में कला के क्षेत्र में रुचि रखने वाले विश्व के शीर्ष कारपोरेट घरानों से लेकर रसूखदार लोगों में इनकी पहचान है। 
रिश्तेदार आइपीएस लिवा गये दिल्ली 
दिल्ली कैडर के आइपीएस रहे स्वर्गीय मारकंडे सिंह (जो बाद में वहां के लेफ्टिनेंट गवर्नर भी रहे) उन्हें उनके पिता के अनुरोध पर दिल्ली लिवा गये। मारकंडे सिंह घोसी तहसील क्षेत्र के माउरबोझ के निवासी व आरएन सिंह के रिश्तेदार थे। घर की माली हालत में कुछ सहयोग करने के लिये नौकरी के लिये 1977 में आरएन सिंह दिल्ली पहुंचे। वहां उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा चलाई प्रूफ रीडिंग की निःशुल्क ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद गर्वनमेंट प्रेस में प्रूफ रीडर की जगह निकलने का इंतजार करने लगे। इंतजार में समय व्यतीत होता देख उन्होंने मारकंडे सिंह से कहीं प्राइवेट नौकरी लगवाने का आग्रह किया। इसके बाद मारकंडे सिंह ने कनाट प्लेस स्थित धूमिमल आर्ट गैलरी के मालिक से बातकर इन्हें 1978 की शुरुआत में बतौर ट्रेनी नौकरी दिलवा दी। आर्टिस्टों की पेटिंग के उस शोरुम में उन्होंने छह सौ रुपये प्रतिमाह पर नौकरी शुरु की। 
ऐसा रमा मन, ठुकरा दी सरकारी नौकरी 
धूमिमल गैलरी में उन्हें पेटिंग्स की फ्रेमिंग बनवाने, समारोहों में लोगों को आमंत्रित करने व आमंत्रण कार्ड छपवाने का काम दिया गया। इन कामों में उनका मन ऐसा रमा कि उनके भीतर का भी कलाकार जग गया। कुछ ही माह में उनकी व्यवस्थित कार्यप्रणाली से प्रभावित होकर धूमिमल गैलरी के मालिक ने उनकी तनख्वाह छह सौ से बढ़ाकर आठ सौ कर दी। पांच-छह महीने बाद 1978 में उन्हें मारकंडे सिंह के प्रयास से वहां के पंजाब नेशनल बैंक में नौकरी लगी। बैंक से उन्हें कर्मचारी के रुप में साढ़े पांच सौ रुपये तनख्वाह मिलनी थी। उससे ढाई सौ रुपये अधिक वह धूमिमल गैलरी में पा रहे थे। दूजे चित्रकला के नए संसार में उनका मन बस गया था। इसलिये उन्होंने नौकरी ज्वाइन ही नहीं की। बाद में इंडियन एयरलाइंस व गवर्नमेंट प्रेस आफ इंडिया दिल्ली में भी जाब मिला, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया। वह कला के ही क्षेत्र में कैरियर बनाने का मन ही मन निश्चय कर चुके थे। 
12 साल तक सीखी बारीकी, संभाला घर-बार  
धूमिमल आर्ट्स गैलरी में उन्होंने 12 साल तक चित्रकला व पेंटिग्स कारोबार की बारीकी सीखी। इस दौरान बढ़ती रही पगार से उन्होंने अपना घर-बार संभाला। खुद के पास महीने भर खर्च की रकम रखकर शेष रुपये घर भेजते रहे। पांच भाइयों व एक बहन में सबसे बड़े आरएन सिंह ने अभिभावक का रोल अदा करते हुए चार भाइयों को पढ़ाया-लिखाया और विभिन्न क्षेत्रों में नौकरी दिलाने में सहभागी बने। इकलौती बहन की शादी में भी परिवार का आर्थिक बोझ कुछ हद तक कम किया। भाइयों के अपने पैरों पर खड़ा होने के बाद घर-परिवार से चिंतामुक्त होने के बाद उन्होंने 1990 के बाद कला के व्यवसाय में खुद का भाग्य आजमाने का निर्णय लिया। 
वसंत विहार में खोली प्रोग्रेसिव आर्ट गैलरी 
वर्ष 1990 के बाद उन्होंने धूमिमल आर्ट गैलरी की नौकरी को अलविदा कह दिया। इसके बाद खुद का कारोबार करने का ताना-बाना बुनने लगे। यहां एक-दो साल उन्होंने चित्रकला व पेटिंग्स कारोबार में जानने के लिये भागम-भाग की। धनाभाव के बीच 1995 में दिल्ली के वसंत विहार में खुद की प्रोग्रेसिव आर्ट गैलरी खोल दी। यहां पेटिंग्स खरीदने में धन का अभाव होने पर धूमिमल आर्ट गैलरी में आयोजित समारोहों में आमंत्रण करने के दौरान विश्व विख्यात चित्रकारों व उनकी पेटिंग्स की बिक्री का कार्य देखने वालों से उनका जुड़ाव काम आया। एमएफ हुसैन, एफएन सूजा, वीएस गायतोंडे, तैयब मेहता, अकबर पदमसी सरीखे चित्रकारों की पेटिंग्स उन्हें उधार मिलने लगी। नामचीन चित्रकारों की पेंटिग्स इस विश्वास पर मिलने लगी कि बेचने के बाद आधी रकम उन्हें देनी थी। 
खरीदने लगे संदेशयुक्त दुर्लभ पेंटिग्स 
उधार पर मिलने वाली पेंटिंग्स को बेचकर आधी रकम चित्रकारों के देते-देते कुछ समय बाद उनकी आर्थिक दशा सुदृढ़ हो गई। इसके बाद उन्होंने चित्रकारों की संदेशयुक्त दुर्लभ पेंटिग्स 10-20 की संख्या में एक साथ नकद खरीदना शुरु किया तो उधार की तुलना में कुछ सस्ती मिलने लगीं। दुनिया भर के पेटिंग्स के शौकीन कारपोरेट घरानों व राजा-रजवाड़ों से धूमिमल गैलरी में बने उनके ताल्लुकात व नामचीनों की एक से बढ़कर एक पेटिंग्स का मेल होने के चलते प्रोग्रेसिव आर्ट गैलरी की पहचान दुनिया भर में बनी। कारोबार भी दिन-दूना, रात-चौगुना रफ्तार पकड़ लिया। व्यावसायिक लिहाज से उन्होंने लंदन व दुबई में भी अपना शोरुम खोल दिया। उनके शोरुमों में दिवंगत चित्रकार जे स्वामीनाथन, नंदलाल बोस, रविंद्रनाथ टैगोर, रामकिंकर बैज, जामिनी राय, केएच आरा की भी पेंटिंग्स हैं। हाल ही में वीएस गायतोंडे की एक पेंटिग्स उनके शोरुम से 42 करोड़ रुपये में बिकी है। 
हुसैन की शीशे से बनी पेंटिग्स खरीदी 
आरएन सिंह के तीनों शोरुमों में लगी पेंटिग्स के खरीदार भारत में टाटा, बिड़ला, डालमिया, रिलायंस समूह जैसे कारपोरेट घराने हैं तो विभिन्न देशों में वहां के धनाढ्य परिवार हैं। बुलंद आवाज के एक सवाल के जवाब में आरएन सिंह ने चित्रकला कारोबार से जुड़ा एक किस्सा सुनाया। उन्होंने बताया कि एमएफ हुसैन एक बार इटली के मोरानो शहर गये थे। वहां शीशे की कलाकारी में ढली संस्कृति देखे। हर घर व प्रतिष्ठान में शीशे के कप, प्लेट, मेज आदि का उपयोग था। हुसैन ने वहां ग्लास (शीशा) कलाकारों की सहायता से खुद की डिजाइन व विषय की शीशे की पांच पेंटिंग्स बनाई। एक पेंटिंग्स में पांच घोड़े बने थे। इटली में बनी पांचों पेंटिंग्स दुबई लाई गईं। उनमें से एक पेंटिंग्स ब्रिटेन के सबसे धनी व वर्ल्ड में स्टील के सबसे बड़े उत्पादक लक्ष्मीनिवास मित्तल ने खरीदा। दूसरी पेंटिंग्स विश्व भर में हिंदुस्तान के असलहों के बड़े कारोबारी बोबो चौधरी ने खरीदी। तीसरी पेंटिंग्स कतर के बादशाह की बेगम ने खरीदी। चौथी पेंटिंग्स हुसैन साहब ने अपने घर की शोभा बढ़ाने को रख ली। पांचवीं पेंटिंग्स पांच करोड़ में आरएन सिंह ने खरीदी। पांचों में चार पेंटिग्स जिनके पास गईं वह बेची नहीं जानी हैं। पांचवीं पेंटिग जो उनके पास है उसकी कीमत वह डेढ़ सौ करोड़ मांगें तो भी खरीदार मिल जाएंगे। 
मोदी व नीतीश कर चुके हैं सराहना 
आरएन सिंह की कला प्रदर्शनी की सराहना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कर चुके हैं। नौ जनवरी 2019 को प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 15वां प्रवासी भारतीय दिवस मनाया गया। महात्मा गांधी नौ जनवरी को ही दक्षिण अफ्रीका से पहली बार भारत आए थे। इसलिये इसी तिथि को प्रवासी भारतीय दिवस कार्यक्रम आयोजित होता है। उस कार्यक्रम में पीएमओ के अनुरोध पर आरएन सिंह ने बीएचयू के कला संकाय में गांधी के विचारों को कैनवास पर गांधी के विचारों को आकार देते हुए प्रदर्शनी लगाई। इसका विषय था कलाकारों की दृष्टि में गांधी क्या? इसे प्रवासी भारतीयों ने तो सराहा ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सराहना करते हुए आरएन सिंह को धन्यवाद ज्ञापित किया। इसके पहले 2017 में पटना में बने शानदार म्यूजियम के उद्घाटन के अवसर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पीएस अंजनी कुमार सिंह के आग्रह पर महात्मा गांधी के चंपारण गये 100 साल पूरे होने पर प्रदर्शनी लगाई थी। उसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने काफी सराहा। 
लगा चुके हैं तीन सैकड़ा पेंटिंग्स प्रदर्शनी 
आरएन सिंह भारत में दिल्ली से लेकर मुंबई तक 40 साल में तीन सौ से अधिक चित्रकला प्रदर्शनी लगा चुके हैं। इनमें एफएन सूजा, जे स्वामीनाथन, बिमलदास गुप्ता, अंबा दास, विकास भट्टाचार्य, मंजीत बाबा, ईसा पूर्व सान्याल, कृष्ण खन्ना, वीएस गायतोंडे, शंकु चौधरी, केएस कुलकर्णी, एसएच रजा, रामकुमार, जीआर संतोष, मनु पारेख, जोगेन चौधरी, आरएस बिष्ट, जयराम पटेल, पिराजी सगरा, सोहन कादरी, ए रामचंद्रन, अंजली इला मेनन, हिम्मत शाह, एमएफ हुसैन, दिनकर कौशिक, केजी सुब्रमण्यम, सुहास राय, जंगढ़ सिंह श्याम, विद्यासागर उपाध्याय, अकबर पद्मसी, जैमिनी राय, सैलोज मुखर्जी, नंदलाल बोस, रामकिंकर बैज, गणेश पाइन, बद्री नारायण, हरिकिशन लाल भगतो, अश्विन मोदी, बीरेन डे, के लक्ष्मण गौड़, टी वैकुंठम, विवान सुंदरम, परमजीत सिंह, अपर्णा कौर, अर्पिता सेन, माधवी पारेख, सदानंद  बकरे, पी मनसा राम, प्रफुल्ल मोहंती, दीपक बनर्जी, सूर्यप्रकाश, जे सुल्तान अली, केके हेब्बार, गुलाम शेख, नसरीन मोहम्मद, बीएन आर्य, एके अरस, एचए गाडी, प्रदेष दास गुप्ता, सोमनाथ होरे की पेंटिग्स प्रदर्शनी शामिल है। कुछ चित्रकारों की एकल तो कुछ की दो तीन और चार सोलो प्रदर्शनी लगाई। 
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यहां किया प्रदर्शन 
देश के बाहर उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों में भी पेंटिग्स का प्रदर्शन किया। इनमें टेट माडर्न गैलरी लंदन, 2007 में बेसल आर्ट फेयर स्विट्जरलैंड, 2008 में माननीय कांगकला मेला, 2009 व 2011 में दुबई कला मेला, 2010 में सिंगापुर कला मेला, 2013, 2014 व 2015 में लंदन में समूह प्रदर्शनी व न्यूयार्क कला मेला शामिल हैं। 
अध्ययन करने घूमे देश-विदेश 
आरएन सिंह चित्रकला की विशेषता का अध्ययन करने देश-विदेश भी घूमे हैं। भारत में उन्होंने भारतीय संग्रहालय भारत भवन भोपाल, सालारगंज संग्रहालय (महाराज फतेह सिंह), शिवाजी संग्रहालय मुंबई, कलकत्ता संग्रहालय, राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली, राष्ट्रपति भवन संग्रहालय नई दिल्ली, राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली, इलाहाबाद संग्रहालय, भारत कला भवन बीएचयू का भ्रमण किया। विदेशों में इंटरनेशनल संग्रहालय टेट माडर्न आर्ट गैलरी, लंदन विक्टोरिया अल्बर्ट संग्रहालय, लंदन ब्रिटिश संग्रहालय, लंदन नेशनल गैलरी, लंदन लौवर संग्रहालय पेरिस, फ्रांस न्यूयार्क मेट्रोपालिटन आर्ट म्यूजियम, यूएसए सिम्थ सोनियन कला संग्रहालय, यूएसए कला के संकाय हार्वर्ड कुन्थौस ज्यूरिख संग्रहालय स्विट्जरलैंड, प्राडो ललित कला संग्रहालय स्पेन, पोम्पीडौ केंद्र पेरिस फ्रांस पेरगामन संग्रहालय बर्लिन जर्मनी मुसीडी आर्मे पेरिस में भी उन्होंने अध्ययन कर ज्ञान अर्जित किया। इसके अलावा इन्होंने चित्र कला की महत्ता पर अनेकों व्याख्यान दिया है।  
यह भूमिका भी कर चुके हैं अदा 
आरएन सिंह शाहजहां आर्ट गैलरी वसंत विहार नई दिल्ली के संस्थापक हैं। 1978 से 1989 तक धूमिमल आर्ट गैलरी नई दिल्ली के मैनेजर रहे हैं। चित्रकार एफएन सूचा के 1983 से 1989 तक रेजिडेंट मैनेजर रहे। भारत भवन भोपाल में स्वर्गीय जे स्वामीनाथन के सहयोगी सलाहकार की भी जिम्मेदारी इन्होंने निभाई। 1982 में रुजवेल्ट हाउस में अमेरिकी दिवस पर इन्होंने अमेरिकी दूतावास नई दिल्ली में मशहूर चित्रकारों की पेंटिंग्स प्रदर्शनी लगाई। 1982 में श्री चेस्टर हेर्विट्स के भारतीय सलाहकार रहे हैं। 1983 में विज्ञान भवन में गुटनिरपेक्ष देशों के सम्मेलन में इन्होंने कला प्रदर्शनी लगाई। प्रतिभाशाली लोगों को मंच देने के लिये दिल्ली में उत्तर रंग की शुरुआत की। 1998 से 2000 तक आइएम गैलरी नई दिल्ली के डायरेक्टर आफ आर्ट्स रहे। 2000 से 2002 तक भारत सरकार के संस्कृति विभाग के वरिष्ठ साथी कलाकार रहे। 2002 से 2005 तक इंडिया इंटरनेशनल सेंटर लोधी रोड नई दिल्ली में कला के मानद सलाहकार रह चुके हैं। अभिलेख प्रबंधन, अभिलेखागार, आधुनिकीकरण संग्रहालय के सलाहकार निदेशक की भी भूमिका निभा चुके हैं। भारतीय कला कार्ट में कला निवेश पर कला निवेश मंत्र नामक इनकी पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। 
आपदा से बचाव में बनते हैं मददगार 
आरएन सिंह की समाजसेवा में भी बेहद रुचि है। आपदा प्रबंधन व बचाव के उपाय के लिये उन्होनें तकनीशियनों की पूरी टीम खड़ी कर रखी है। ग्लोबल रेस्क्यू फाउडेंशन के जरिये उनकी टीम भारत सहित विश्व के तमाम देशों की ऐतिहासिक धरोहरों को बचाये रखने के लिये वर्क करती है। इसके अलावा बाढ़, भूकंप व अन्य आपदाओं से होने वाली तबाही से बचाने के लिये उनका कार्य चलता रहता है। स्कूली बच्चों से इनका फाउंडेशन आपदा से राहत व बचाव का प्रशिक्षण देता रहता है। एनडीआरएफ के जवानों को भी नई- नई तकनीक से अवगत कराया जाता है। 
25 अगस्त 1958 को रसड़ी में लिया जन्म 
विश्व में कला जगत के स्तंभ बन चुके आरएन सिंह का जन्म 25 अगस्त 1958 को घोसी तहसील क्षेत्र के रसड़ी गांव में हुआ। गत 13 मार्च 2022 को गोलोकवासी हुए इनके पिता इंद्रासन सिंह पेशे से किसान थे। अपने पिता की छह संतानों (पांच बेटे-एक बेटी) में आरएन सिंह सबसे बड़े थे। दूसरे नंबर वाले रामजन्म सिंह दिल्ली पुलिस के एसआइ से सेवानिवृत्त हैं। तीसरे नंबर के रामकेर सिंह डीएसआइडीसी (दिल्ली स्टेट इंड्रस्टीज डवलपमेंट कारपोरेशन) में नौकरी करते हैं। चौथे नंबर के रामप्रभाव सिंह मऊ में प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक व वेतनभोगी सहकारी ऋण समिति बेसिक शिक्षा के जिलाध्यक्ष हैं। पांचवें नंबर के रामनरेश सिंह को भी आरएन सिंह ने दिल्ली में नाइक शूज कंपनी में मैनेजर की नौकरी दिलाई थी, लेकिन बाद में वह छोड़कर घर आकर पिताजी का खेती-गृहस्थी में हाथ बंटाने लगे।

पिता की आखिरी घड़ी में रहे साथ
आरएन सिंह की कक्षा एक से पांच तक की शिक्षा रसड़ी गांव में स्थित प्राथमिक विद्यालय सरायगनेश में हुई। अपने ही गांव में स्थित जूनियर हाईस्कूल सरायगनेश से उन्होंने छह से आठवीं तक की पढ़ाई की। कक्षा 9 से 12वीं तक की शिक्षा उन्होंने सर्वोदय इंटर कालेज घोसी से अर्जित की। 1976 में इंटरमीडिएट उत्तीर्ण करने के बाद घर की कमजोर आर्थिक स्थिति के मद्देनजर आगे की पढ़ाई की मंशा छोड़ दी। पिता इंद्रासन सिंह के अनुरोध पर 1977 में रिश्तेदार आइपीएस मारकंडे सिंह दिल्ली लिवाकर चले गये और वहां प्रूफ रीडर की ट्रेनिंग के पश्चात धूमिमल आर्ट गैलरी में नौकरी दिला दी। पिछले दो माह से रसड़ी गांव में रह रहे आरएन सिंह को सबसे बड़ी आत्म संतुष्टि इस बात की है वह अपने पिता की आखिरी घड़ी में उनके साथ रहे। वह बताते हैं कि उन्होंने खुद से प्रण किया था कि उन्हें संस्कारित, कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदारी से दायित्व निभाने की प्रेरणा देने वाले पिताजी के साथ वह आखिरी समय में जरुर रहेंगे। वह बीमार पिता की दो माह तक उठाने-बैठाने, खिलाने-पिलाने तक सेवा किये। उनके पिता ने आखिरी सांस भी उनकी गोंद में ही ली। इस दो माह में उन्होंने अपने पेंटिंग्स कारोबार को पूरी तरह से भुलाकर शुद्ध गंवई परिवेश में अपने पिता का वही दुलरुआ बेटा रामनवल बनकर जिया, जैसा जन्म से 1977 में दिल्ली जाने से पहले जिया करते थे।  
माटी के लिये बहुत कुछ करने की चाह 
आरएन सिंह से बुलंद आवाज ने जन्मभूमि के लिये कुछ कर गुजरने पर बात की तो उन्होंने कहा कि माटी के लिये बहुत कुछ करने की चाह है। यूपी सरकार उन्हें मौका दे तो वह यहां यूपी कला भवन बनवाने को तैयार हैं। हम थियेटर, नृत्य, गायन, चित्रकला आदि कलाकारों को गांवों में कैंप कराकर लोगों की मानसिक व सामाजिक दशा सुधारने को कार्य करना चाहते हैं। कलाकारों की सहभागिता से यूपी संस्कृति प्रदेश हो जाएगा, बशर्ते इसके लिये सरकार को मदद के लिये आगे आना होगा। इसके अलावा मऊ जिले की प्रतिभाओं को भी आगे बढ़ाने की सोच है। उनके पास मऊ के खेती-किसानी से जुड़े हर घर को कृषि से संबंधित व्यापार से ही जोड़ने की योजना है। उन्होंने कहा कि यहां हर किसान परिवार गन्ना के रस से सिरका बनाना जानता है। इस सिरके का पेट के रोगों में पूरे विश्व में उपयोग है। लोग उत्पादन करना शुरु करें तो जितनी लागत, उतना ही मुनाफा देकर सिरके की खरीद कर अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में खपत करा देंगे। अपने यहां टमाटर की अच्छी खेती होती है। यहां टमाटर का सॉस बनाने को लोग इच्छुक हों तो उनके प्रशिक्षण दिलाकर उत्पादन कराकर उसकी इंड्रस्टीज स्थापित कर यहां का प्रोडक्ट पूरे विश्व में बिकने लगेगा। उन्होंने कहा कि इनके समेत अन्य योजनाएं भी हैं। जन्मभूमि के लिये कछ सकारात्मक व सामाजिक, आर्थिक दशा सुधारने की दिशा में कुछ प्रयास अवश्य करुंगा।

 



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