मऊ के लाल सिसौदिया को हासिल हुआ आइपीएस का मुकाम 

10 Nov 2022

-तीन नवंबर को जारी हुआ नोटिफिकेशन, 30 पीपीएस अफसरों को मिली प्रोन्नति
-डीजी व एडीजी ने लगाया आइपीएस का बैज, भदींड़ गांव में दौड़ी खुशी की लहर  

बृजेश यादव 
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मऊ :
पुलिस सेवा में कार्यरत जिले के लाल अनिल सिंह सिसौदिया को आइपीएस का मुकाम हासिल हो गया। विगत तीन नवंबर को प्रोन्नति पाकर आइपीएस बने 30 पीपीएस अफसरों में उनके भी शामिल होने से मुहम्मदाबाद गोहना ब्लाक के भदींड़ गांव में जश्न का माहौल बन गया। प्रोन्नति सिसौदिया की हुई, लेकिन उनके आइपीएस बनने पर गर्व पूरे जनपदवासियों को हो रहा है। उनके जानने वाले सोशल प्लेटफार्म फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर आदि माध्यमों से उन्हें बधाई देने के साथ ही खुशी का इजहार भी कर रहे हैं। डीजी आरके विश्वकर्मा व एडीजी आरके स्वर्णकार द्वारा उन्हें आइपीएस का बैज लगाये जाते ही शुभचिंतकों में खुशी की लहर दौड़ गई। 

बोरा-पटरी से इलाहाबाद विश्वविद्यालय तक का सफर 
अनिल सिंह सिसौदिया का जन्म मुहम्मदाबाद गोहना तहसील क्षेत्र के भदींड़ गांव में 1967 में हुआ। वह स्व.श्यामकीरत सिंह के पुत्र हैं। किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले सिसौदिया की प्रारंभिक शिक्षा प्राथमिक विद्यालय भदींड़ में बोरा-पटरी से हुई। कक्षा छह से आठवीं तक वह गांव के ही जूनियर हाईस्कूल से पढ़े। कक्षा नौ से 12वीं तक की पढ़ाई के लिये वह प्रतिदिन तीन कोस (9 किलोमीटर) साइकिल चलाकर आजमगढ़ जिले के स्मिथ इंटर कालेज अजमतगढ़ जाते। इंटर तक साइंस के विद्यार्थी रहे सिसौदिया स्नातक करने इलाहाबाद विश्वविद्यालय गये तो वहां उन्होंने सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिये आर्ट विषयों का चयन किया। हिंदी, प्राचीन इतिहास व दर्शन शास्त्र विषय से दाखिला लिया। एक साल तक गोविन्दपुर कालोनी में किराये के कमरे में रहकर पढ़ाई के साथ-साथ भोजन पकाने का गुर सीखने से जूझना पड़ा। इसके बाद वह केपीयूसी छात्रावास में आ गये। इलाहाबाद (प्रयागराज) विश्वविद्यालय में 1991 में एमए प्रथम वर्ष में वह अपने बैच के टॉपर रहे। 

मार्गदर्शन से दिलाया कइयों को मुकाम 
भदींड़ गांव के लोगों को गर्व है कि उनकी माटी में अनिल सिंह सिसौदिया जैसा लाल है। हिन्दू-मुस्लिम हर वर्ग के लोगों का उन पर उतना ही भरोसा है, जितना की उनके परिवार के सदस्यों का। वह किसी से कोई भेद नहीं रखते। आज उनके मार्गदर्शन से गांव के कइयों को शानदार मुकाम मिल चुका है। उनके खुद की तैयारी के लिये बनाये गये नोट्स, अध्ययन के लिये जुटाई गई पुस्तक, गाइडें और उनके द्वारा दी गई कोचिंग से भदींड़ क्षेत्र के कई युवा आईएस, आईआरएस व पीपीएस क्वालीफाई कर मुकाम पर हैं। सऊदी में जाकर फंसे गांव के मौर्या परिवार के लड़के की जानकारी होने पर उन्होंने विदेश मंत्रालय के सहयोग से उसकी वापसी कराने में महती भूमिका अदा की। 

सिसौदिया क्रिकेट क्लब के कैप्टन ने संवारा गांव 
किशोरावस्था में सिसौदिया क्रिकेट क्लब का गठन कर कप्तान अनिल सिंह ने अपनी टीम का भी आसपास के क्षेत्रों में लोहा मनवाया। इस टीम ने क्षेत्रीय टूर्नामेंट के कई खिताब झटके। सिसौदिया इस समय जिस मुकाम पर हैं, वह भी चाहते तो अन्य अफसरों की तरह गांव को पीछे छोड़ राजधानी या महानगरों में अपना ठिकाना बना लेते, लेकिन ऐसा नहीं है। जन्मभूमि से गहरा नाता रखने वाले सिसौदिया उसे संवारते भी हैं। उनके प्रयास से वर्ष 2016 में पर्यटन मंत्री ओमप्रकाश सिंह के माध्यम से गांव के कोठिया धाम के लिये 11 लाख रुपये स्वीकृत हुआ। इस धनराशि से धाम की चहारदीवारी व परिक्रमा मार्ग का कायाकल्प हुआ। इसके बाद उनकी पहल पर जिला पंचायत अध्यक्ष सुनील सिंह चौहान के कार्यकाल में जिला पंचायत से 20  लाख की लागत से 400 मीटर इंटरलाकिंग का कार्य हुआ। मंत्री मोती सिंह के माध्यम से राजनाथ गुप्ता के घर से इंटर कालेज भदींड़ तक इंटरलाकिंग कार्य कराया। 

जननी जन्मभूमिश्च स्वार्गादपि गरीयसी को किया आत्मसात 
संस्कृत का एक श्लोक वाल्मीकि रामायण के कुछ पांडुलिपियों में भी दो रुपों में मिलता है। पहला रुप है मित्राणी, धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव। जननी जन्मभूमिश्च स्वार्गादपि गरीयसी।। इसका अर्थ है मित्र, धन-धान्य आदि का संचार में बहुत अधिक सम्मान है, किन्तु माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है। श्लोक का दूसरा रुप है अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।। इस श्लोक में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम द्वारा रावण का वध करने के बाद लंका पर विजय प्राप्त करने के तुरंत बाद लक्ष्मण से कही गई बात का जिक्र है। प्रभु राम कहते हैं कि यह लंका सोने की बनी है, फिर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है, क्योंकि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं। उनका कहना है कि उन्होंने इन्हीं दोनों श्लोकों का आत्मसात कर लिया है। वह बताते हैं कि नौकरी से जब भी छुट्टी मिलती गांव जरुर जाते हैं। वहां 17 से लेकर 70 साल तक के लोग उनसे मिलने आते हैं। गांव के लोगों की समस्या छोटी हो या बड़ी, अगर उनसे समाधान होने लायक है तो वह तत्काल प्रयासरत हो जाते हैं। उनकी पूरी कोशिश रहती है कि गांव के शादी-विवाह व मांगलिक आयोजनों के हर बुलावे में वह शामिल हों। 

ट्रेनिंग के दौरान ही हो गए चर्चित 
अनिल सिंह सिसौदिया की न्यायपरक पुलिसिंग का प्रमाण ट्रेनिंग के दौरान ही मिल गया। पीपीएस में सलेक्शन के बाद उन्हें थानाध्यक्ष की ट्रेनिंग के लिये महाराजगंज जिले के पनियरा थाने की कमान दी गई। उसी समय एक बच्ची का मर्डर हुआ। उस हत्याकांड को लेकर लोगों ने पुलिस को निशाना बना शुरु कर दिया था। घटना का वास्तविक खुलासा करना पुलिस के लिये अहम चुनौती थी। कई दिन तक दिन-रात लगे रहकर, दर्जनों से पूछताछ करने के बाद घटना का वर्कआउट कर वह चर्चित हुए। उन्होंने मुख्य आरोपी के बचाव में की जा रही पैरवी को अनसुना कर दोषी को सलाखों को पीछे भेज दिया। 

कानून का राज स्थापित करने को उठाया जोखिम 
खाकी वर्दी धारण करने के बाद कानून व शांति व्यवस्था का राज स्थापित करने में जोखिम भी उठाना पड़ा। अक्टूबर 2012 में फैजाबाद (अयोध्या) में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान सापं्रदायिक बवाल के बाद दंगा हो गया। उस समय सिसौदिया रुदौली सर्किल के क्षेत्राधिकारी थे। फैजाबाद में दंगा होने के बाद जिले भर की अधिकतर फोर्स शहर में बुला ली गई। इधर दंगे की आंच रुदौली में भी पहुंच गई। यहां मुट्ठी भर फोर्स के साथ बवाल रोकने की कोशिश में जुटे सिसौदिया पर भी हमला हुआ। उनका सिर फूट गया। बावजूद इसके उन्होंने होश नहीं खोया और खाकी धारण करते समय लिये संकल्प को याद कर माहौल बिगड़ने न देने के लिये बुद्धि-विवेक से काम लिया। तत्कालीन एसडीएम रामसूरत पांडेय के साथ वह मौके पर डटे रहे। विसर्जन जुलूस नहीं रुकने दिया। दोनों वर्ग के लोगों से निरंतर वार्ता कर हिंदुस्तान की एकता व अखंडता के साथ बवाल से नुकसान का खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को उठाने का बोध कराते रहे। उनका अथक प्रयास रंग लाया। रुदौली की जनता प्रशासन के सहयोग में उतर आई। और इलाकों में दंगा भले हुआ, लेकिन यहां सौहार्द स्थापति होने की मिसाल बनी। 

धर्मस्थल में रेप की कोशिश करने वाले को दबोचा 
सीओ के रुप में फैजाबाद में अपनी कर्तव्यनिष्ठा से हर वर्ग में लोकप्रिय हो चुके सिसौदिया की पब्लिक कनेक्टिविटी 2018 में भी काम आई। तब उनकी तैनाती वहां एसपी सिटी के रुप में थी। हुआ यूं कि एक संप्रदाय की लड़की को दूसरे संप्रदाय का युवक अपने धर्मस्थल में लेकर चला गया। वहां उसने रेप करने की कोशिश की। यह खबर जंगल में लगी आग की तरह चारों ओर फैली तो एक वर्ग के लोग आरोपी पर कार्रवाई की मांग को लेकर जगह-जगह चक्काजाम कर दिये। पुलिस ने युवती को तो बचा लिया, लेकिन आरोपी की गिरफ्तारी के लिये पब्लिक के प्रदर्शन से जबर्दस्त दबाव था। आरोपी मोबाइल भी प्रयोग नहीं करता था। पुलिस के सर्विलांस समेत अन्य इलेक्ट्रानिक सिस्टम भी उस तक पहुंचाने में कारगर साबित नहीं हो सकते थे। ऐसे समय में सिसौदिया का सीओ कार्यकाल का पब्लिक से जुड़ाव काम आया। उन्होंने आरोपी के वर्ग के लोगों की ही मुखबिरी व मदद से उसे गिरफ्तार कराकर सलाखों के पीछे भेजवाया, तब जाकर आंदोलित लोगों का गुस्सा थमा। उनकी इस सफलता के मुरीद यूपी के पुलिस महानिदेशक भी हुए। उन्होंने सिसौदिया को रजत प्रशंसा चिन्ह से नवाजा। 

पहले प्रयास में ही आईएस का प्री इक्जाम क्वालीफाई 
अनिल सिंह सिसौदिया की बुद्धिलब्धि पढ़ाई के दिनों में भी सामान्य से ऊपर थी। 1991 में हिन्दी विषय से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष में उन्होंने अपने बैच को टाप कर इतिहास रचा। इसी वर्ष वह सिविल सर्विसेज में आईएस की प्री परीक्षा को क्वालीफाई कर पूरे यूनिवर्सिटी में चर्चित हो गये। उन्होंने 1992 व 93 में भी प्री क्वालिफाई कर मेन परीक्षा में शामिल हुए। 1993 में पीसीएस क्वालिफाई करने के बाद उनका सलेक्शन पीपीएस के लिये हुआ। उन्होंने पुलिस उपाधीक्षक के रुप में अपनी पसंदीदा खाकी धारण कर ली। अनिल सिंह सिसौदिया का ख्वाब भी अजीब था। यह ऐसा ख्वाब था कि वह आईएस व पीसीएस वर्ग में यदि टाप भी करते तब भी डीएम-एसडीएम की बजाय एसपी-सीओ ही बनते। वह आवेदन करते समय प्रथम वरियता में आईपीएस व पीपीएस का ही सलेक्शन करते थे। इस संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने बुलंद आवाज से बताया कि उनका खुद का मानना रहा है कि गरीब, पीड़ित, शोषित को त्वरित न्याय पुलिस विभाग की दे सकता है। वह अपने कार्यकाल में अब तक हजारों पीड़ितों को त्वरित न्याय दिला चुके हैं। उनका सदैव प्रयास रहता है कि थाने स्तर पर ही पीड़ित को न्याय मिले।  

इन जिलों में रही तैनाती 
पीपीएस में सलेक्शन के बाद सिसौदिया का 1997-98 में मुरादाबाद ट्रेनिंग सेंटर में प्रशिक्षण हुआ। जनपद स्तर के ट्रेनिंग के लिये उन्हें 1998-99 में गोरखपुर व महाराजगंज जिला भेजा गया। महाराजगंज के पनियरा थाने पर थानाध्यक्ष की तैनाती की ट्रेनिंग ली। इसके बाद सीओ के रुप में गोंडा, अंबेडकरनगर, बस्ती, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बांदा, सुल्तानपुर, हाथरस, लखनऊ (गोमतीनगर, गाजीपुर, अलीगंज सर्किल), फैजाबाद (रुदौली व सीओ सिटी) में तैनात रहे। फैजाबाद में ही उनकी पदोन्नति एएसपी के रुप में हो गई। वह कुछ दिनों तक अयोध्या में इंटेलिजेंस विभाग में भी तैनात रहे। कानपुर में बिजली विभाग के एसपी केसको की जिम्मेदारी का निर्वहन किया। एएसपी के रुप में कौशांबी, पीएसी गोंडा के डिप्टी कमांडेंट, सवा दो साल तक गाजीपुर के एसपी आरए, एएसपी भदोही, एसपी सिटी फैजाबाद, एएसपी बागपत व पांच महीने तक एडीजी जोन वाराणसी के स्टाफ आफिसर के पद पर कार्य किये। कई महीनों तक एसटीएफ मुख्यालय लखनऊ के प्रभारी एसएसपी के रुप में कार्य किया। आइपीएस बनने से पहले वह जनपद कासगंज में अपर पुलिस अधीक्षक रहे। वर्तमान समय में पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड लखनऊ के पुलिस अधीक्षक के रुप में उनकी तैनाती है। 



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