दुश्मनों की जमात में डान का खजाना 

21 Dec 2022

बृजेश यादव
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लखनऊ :
 गाजीपुर के युसुफपुर मुहम्मदाबाद में जन्मा मुख्तार अपने दुश्मनों को मात देता रहा और दुश्मनों की जमात के बीच ही अपने विश्वासपात्र बनाकर अपना खजाना भी उनके ही पास सुरक्षित रखता रहा। यह किस्सा दुश्मनों के जमात में मुख्तार अंसारी के अवैध धन से आगे बढ़ने वालों का ब्यौरा जुटाने में जुटी ईडी के सूत्रों से मिली अहम जानकारी पर है। 
1980 के दशक में युसुफपुर मुहम्मदाबाद तहसील क्षेत्र में भूमिहारों का वर्चस्व था। ठेका पट्टा, राजनीतिक व प्रभावशालियों में भूमिहारों की गिनती होती थी। अपने युवावस्था में पूर्वांचल के मकनू सिंह गैंग में शामिल होने के बाद मुख्तार अंसारी अपने को आका साबित कराने में जुट गया। यहीं से शुरु हुई उसकी भूमिहारों से वर्चस्व की जानलेवा जंग। इस जंग में हत्याओं की शुरुआत हुई 1988 में। स्थान था गाजीपुर का युसुफपुर मुहम्मदाबाद चौराहा। मंडी परिषद के चर्चित ठेकेदार सच्चिदानंद राय की इसी चौराहे पर दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। सच्चिदानंद राय मुहम्मदाबाद के बगल के गांव हरिहरपुर के रहने वाले थे। इस हत्याकांड में मुख्तार अंसारी व उसके साथी साधू सिंह का नाम आया। वर्चस्व के लिये की गई इस हत्या में मुख्तार व साधू नामजद हुए। बताया जाता है कि सच्चिदानंद राय की हत्या वर्चस्व को लेकर की गई। इसी हत्याकांड से मुख्तार अंसारी की भूमिहारों से दुश्मनी हुई तो एक-एक कर हत्याओं का सिलसिला बढ़ता गया। 
सच्चिदानंद की हत्या के बाद मुख्तार व साधू सिंह लंबे समय तक फरार रहे। इधर भूमिहारों ने भी इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया। जा पहुंचे बनारस में रह रहे गाजीपुर के मलसा गांव के जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाले दबंग व प्रभावशाली अवधेश राय के पास। उधर मुख्तार अंसारी के पैरलर चल रहा माफिया ब्रजेश सिंह व उसके गिरोह के सदस्यों का भी अवधेश राय के यहां आना-जाना होने लगा। यह सब जानकारी मुख्तार अंसारी को हुई तो उसने अवधेश राय को ही ठिकाने लगाने को ठान लिया। 1990 के दशक के शुरुआती वर्ष में अवधेश राय की हत्या कर दी गई। अवधेश राय को दिनदहाड़े तब गोली मार दी गई जब वह गाड़ी से उतरकर बनारस में लहुराबीर हथुआ मार्केट से सटे अपने घर में गेट से दाखिल हो रहे थे। इस हत्याकांड में मुख्तार अंसारी व उसके साथी भीम सिंह को नामजद किया गया। विगत 15 दिसंबर 2022 को गाजीपुर की अदालत ने मुख्तार अंसारी व भीम सिंह को जिस गैंगस्टर के मामले में 10 साल की सजा सुनाई। उस गैंगचार्ज में अवधेश राय हत्याकांड भी शामिल था। 
अवधेश राय की हत्या के बाद वर्ष 2004 में लोकसभा चुनाव के दिन शोभनाथ राय नामक एक और युवक की हत्या हो जाती है। शोभनाथ राय वर्तमान समय में जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा का पट्टीदार था और वह उनका भतीजा लगता था। उस चुनाव में भाजपा से मनोज सिन्हा और सपा से मुख्तार के बड़े भाई अफजाल अंसारी मैदान में थे। शोभनाथ राय की हत्या तब की गई जब मतदान की समाप्ति के बाद वह मुहम्मदाबाद कार्यालय पर अपने यहां हुई पोलिंग की जानकारी देकर वापस घर लौट रहे थे। शोभनाथ राय को गोली मारकर मौत के घाट उतारा गया और उसके साथ मौजूद एक अन्य साथी का मारकर हाथ-पैर तोड़ दिया गया। शोभनाथ की हत्या के ही दिन मतदान के समय एक और भाजपा कार्यकर्ता झिनकू गिहार की भी हत्या हुई थी। झिनकू भी मनोज सिन्हा का काफी प्रिय कार्यकर्ता था। शोभनाथ की हत्या के बाद इस बात की काफी चर्चा रही कि जब वह मुहम्मदाबाद भाजपा कार्यालय से लौट रहा था, उसी समय मुख्तार अंसारी गैंग के सदस्य उसके राजनीतिक क्षेत्र मऊ जा रहे थे। उन्होंने ही रास्ते में शोभनाथ की हत्या की। हालांकि इस मामले में मुख्तार या उसके किसी करीबी को नामजद नहीं किया गया। अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। उधर शोभनाथ की हत्या के बाद भूमिहार बिरादरी के बीएसएनएल के बड़े व दबंग ठेकेदार राजेश राय को गोलियों से भून दिया गया। हरिहरपुर गांव के रहने वाले राजेश राय की मुहम्मदाबाद तहसील के पास हत्या की गई।
इस वर्चस्व की जंग मे ंसाल भी नहीं बीतता की युसुफपुर मुहम्मदाबाद का इलाके में कहीं न कहीं गोली चल जाती और किसी प्रमुख व्यक्ति की हत्या हो जाती थी। उधर माफिया ब्रजेश सिंह भी मुख्तार के दुश्मन भूमिहारों से हाथ मिला चुका था। 2000 के दशक में मुख्तार अंसारी के काफिले पर उसरी चट्टी पर हमला किया गया। जिसमें मुख्तार को बच गया लेकिन उसके दो-तीन साथी मारे गये। मुख्तार अंसारी ने इस हमले में ब्रजेश सिंह के शामिल होने की बात कही थी। 
राजेश राय की हत्या के बाद भाजपा नेता कृष्णानंद राय भूमिहारों के अगुवा बन गये। वह अंसारी बंधुओं से राजनीति में भी दो-दो हाथ करते थे। वर्ष 2002 में कृष्णानंद राय ने अंसारी परिवार को विधायकी के इलेक्शन में हरा दिया और युसुफपुर मुहम्मदाबाद में भाजपा का भगवा लहरा दिया। 1985 से चला आ रहा मुहम्मदाबाद सीट पर अंसारी बंधुओं का कब्जा, इस हार के रुप में मुख्तार को काफी चोट दे गया। उधर कृष्णानंद राय के दाहिना हाथ बन गये थे बच्छलपुर निवासी व भांवरकोल के पूर्व ब्लाक प्रमुख राजेंद्र राय। राजेंद्र राय भी दबंग किस्म के थे और किसी से डरते नहीं थे। राजेश राय की हत्या के बाद कृष्णानंद को कमजोर करने के लिये और अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये राजेंद्र राय को रास्ते से हटाने की रणनीति बनी। पहले राजेंद्र राय को कई बार कृष्णानंद राय का साथ छोड़ने की धमकी दी गई। धमकी का उन पर कोई असर नहीं पड़ा तो 27 जून 2005 को मुख्तार के गुर्गे गोरा राय व अंगद राय ने उन पर गोली चला दी। भागते समय उनकी बाइक गिर गई। वह भागकर मठिया गांव में शिवकुमार के घर में भागे तो घर में घुसकर ही उनकी हत्या कर दी गई। इस मामले में राजेंद्र राय के पिता कपिलदेव राय ने मुख्तार अंसारी व उनके भाई अफजाल अंसारी भी मुकदमा दर्ज कराया, लेकिन विवेचना में साक्ष्य न मिलने पर अंसारी बंधुओं का नाम पुलिस ने निकाल दिया। राजेंद्र राय हत्याकांड में मुख्तार के शूटर गोरा व अंगद राय को अदालत से आजीवन कारावास की सजा हो चुकी है। 
राजेंद्र राय की हत्या के बाद मुख्तार अंसारी के विधानसभा क्षेत्र मऊ में अक्टूबर 2005 में दंगा हो गया। उस दंगे में मुख्तार अंसारी आरोपी बना और जेल चला गया। बताया जाता है कि मुख्तार ने जेल में रहकर भी अपने गैंग का संचालन करता रहा। सूबे में समाजवादी पार्टी की सरकार होने व उसके विधायक होने के चलते जेल में भी उसे माननीय का दर्जा दिया गया। वह जेल से भी अपना साम्राज्य चलाने लगा। जेल में ही बनाई गई रणनीति के तहत 25 नवंबर 2005 को अपने गांव गोड़उर में क्रिकेट टूर्नामेंट का उद्घाटन करने के बाद बगल के गांव में जाते समय भाजपा विधायक कृष्णानंद राय समेत उनके आठ अन्य साथियों को एके 47 से भून दिया गया। कृष्णानंद राय की हत्या के बाद मुख्तार अंसारी का पूर्वांचल में जरायम की दुनिया में एकछत्र राज हो गया। डान ब्रजेश सिंह को युसुफपुर मुहम्मदाबाद में मिल रहा प्रश्रय भी बंद हो गया।  
युसुफपुर मुहम्मदाबाद विधानसभा सीट पर अंसारी बंधुओं से भूमिहार नेता मात खाते रहे फिर ही लोहा लेते रहे। हालांकि इस सीट पर अधिकांश समय तक कब्जा अंसारी बंधुओं का ही रहा। मुख्तार के बड़े भाई अफजाल अंसारी ने इस सीट पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक के रुप में पहली जीत दर्ज की। अफजाल को टक्कर देने वाले अभय नरायन राय कांग्रेस के बैनर तले मैदान में उतरे थे। इसके बाद अफजाल के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी ने विजयशंकर राय को मैदान में उतारा तो मुख्य लड़ाई में वह आ गये। हालांकि उन्हें भी चार बार शिकस्त खानी पड़ी। बाद के चुनाव में अफजाल अंसारी के खिलाफ बहुजन समाज पार्टी ने वीरेंद्र राय को उम्मीदवार बनाया, उसी चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने कृष्णानंद राय को उम्मीदवार बनाया। दोनों भूमिहार नेताओं के बीच स्वजातीय मतों का बिखराव हुआ और अफजाल अंसारी ने उन्हें फिर मात दे दी। हालांकि वर्ष 2002 के चुनाव में पासा पलट गया। भाजपा प्रत्याशी कृष्णानंद राय ने अंसारी बंधुओं का किला ढाह दिया। उन्होंने चुनाव में फतह हासिल कर भगवा फहरा दिया। बताया जाता है कि कृष्णानंद राय की जीत, उभरकर सामने आई भूमिहार लीडरशिप और कृष्णानंद राय द्वारा मुख्तार के जानी दुश्मन ब्रजेश सिंह की की जाने वाली मदद से मुख्तार तिलमिला गया। सलाखों के पीछे से बनी रणनीति के तहत उन्हें आठ साथियों समेत मौत की नींद सुला दी गई। हालांकि इस हत्याकांड में भी मुख्तार साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त हो चुका है। 
तमाम हत्याओं व गैंगवार के बाद पूर्वांचल का डान बन चुके मुख्तार का सिक्का चलने लगा था। जाहिर है जरायम की दुनिया में सिक्का चलने के बाद अधिक से अधिक दौलत बटोरने की चाह हो जाती है। वह मुख्तार में भी हुई। मुख्तार ने अपने परिवार व रिश्तेदारों के नाम पर जो संपत्तियां बनाई, उनमें से बहुत सारी वर्ष 2017 में यूपी में योगी आदित्यानाथ के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद तलाश ली गईं। मऊ, गाजीपुर, लखनऊ सहित प्रदेश के अन्य हिस्सों में अब तक दो अरब से अधिक की जमीन, होटल, गोदाम व अन्य संपत्तियों को प्रशासन गैंगस्टर एक्ट के तहत कुर्क कर चुका है। मुख्यमंत्री के आदेश पर प्रशासनिक टीमें बचीं संपत्तियों की तलाश अभी भी कर रही हैं। लेकिन इसी बीच दर्ज हुए मनी लांड्रिंग के केस में डान की चालाकी व सफलता के कुछ नये मामले सामने आ गये हैं, इनकी टोह में लग गई है ईडी। सूत्रों की मानें तो ईडी के हाथ डान की चालाकी से बहुत आसानी से सामने न आ पाने वाले बनाये गये आर्थिक सामा्रज्य के साक्ष्य लगे हैं। मुख्तार अंसारी ने यह साम्राज्य खड़ा करने में भूमिहारों के ही कंधे पर खेल खेल रखा है। इनमें से तमाम मुख्तार की अवैध रकम से दर्जनों पेट्रोल पंप के मालिक बन बैठे हैं। रुपये लगे हैं मुख्तार अंसारी के और मालिक हैं कोई राय साहब। दर्जनों लोग रियल स्टेट का धंधा डान के पैसे से कर रहे हैं। इसके अलावा कुछ लोग होटल व माल के मालिक बन बैठे हैं। एक-दो तो मुख्तार की रकम से राजनीतिक क्षेत्र में रसूखदार बन चुके हैं। दर्जनों पेशेवर शूटर अपराध की दुनियां में हैं। वह मुख्तार के इशारे पर किसी का भी विकेट गिराने को तत्पर रहते हैं। वजह यह कि उनका ऐश-ओ-आराम से लेकर घर परिवार तक का खर्चा डान उठाता है। मुख्तार की रकम से खुद मालिक बनकर कारोबार करने वाले वैसे तो तयशुदा रकम डान को अधिकतर कैस के रुप में ही पहुंचाते रहे हैं, लेकिन ईडी के हाथ कई कुछ ऐसी रकम का बैंक ट्रांजेक्शन लग गया है, जिसे मुख्तार या मुख्तार का परिवार भले नहीं बता रहा है, लेकिन वह मुख्तार के दम पर रसूखदार बने लोगों की गिरेबान तक ईडी के पहुंचने के लिये पर्याप्त हैं। मुख्तार की बजट से रसूखदार बने भूमिहारों में 90 फीसदी युसुफपुर मुहम्मदाबाद विधानसभा क्षेत्र के ही हैं। वर्ष 2017 में सूबे में योगी की सरकार बनने के बाद मुख्तार के खिलाफ प्रशासन के चल रहे चाबुक के चलते ज्यादातर ने किनारा कस लिया है। यही नहीं डान के टुकड़ों पर पलकर रसूखदार बनने वालों में ज्यादातर ने भाजपा में शामिल होकर अपने बचाव के लिये भगवा धारण कर लिया है। वह भगवा भले ही धारण कर चुके हैं, लेकिन जद में आते ही बख्शे नहीं जा सकेंगे। इसकी जीती जागती नजीर यह है कि मऊ की डा.अलका राय भाजपा की महिला विंग की एक समय सक्रिय नेता हुआ करती थीं, लेकिन जब उनके नाम पर मुख्तार की पेशी के लिये निकाली गई फर्जी एंबुलेंस का खुलासा हुआ तो सरकार ने उनके प्रति भी कोई रहमदिली नहीं दिखाई। जिसका नतीजा यह है कि अलका राय बाराबंकी जेल में बंद रहीं। वर्तमान में मऊ में उनका हास्पिटल भी गैंगस्टर एक्ट के तहत बाराबंकी जिलाधिकारी के आदेश पर कुर्क किया जा चुका है।  ईडी 14 दिसंबर से मुख्तार को कस्टडी में लेकर पूछताछ कर रही है। आज मुख्तार की कस्टडी में आठवां दिन है। ईडी के अफसर पहले से तैयार किये गये एक हजार से अधिक सवालों को मुख्तार के समक्ष घुमा फिराकर पूछ रहे हैं। सूत्रों की मानें तो कस्टडी की समयावधि पूरी होने के बाद मुख्तार को बांदा जेल पहुंचाकर ईडी के अफसर मुख्तार के धन से धनकुबेर बने लोगों को भी नोटिस देकर तलब करेगी। 



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