हर्षिता ने दिया परशुरामपुर को हर्ष से झूमने का अवसर 

18 Jun 2022

-ग्राम रोजगार सेवक हैं पिता, खुद न पढ़ पाने की कमी बच्चों को शिक्षा दिलाकर कर रहे पूरी
-प्रिंटिंग प्रेस और दो बीघा खेती पर निर्भर है तीन भाइयों का परिवार, शिक्षा का समझते मोल
-चिकित्सक बन जनता की सेवा करना चाहती है बिटिया, परिवार ने ठाना पूरा करायेंगे लक्ष्य 

बृजेश यादव 
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परशुराम (मऊ) :
यूपी बोर्ड की हाईस्कूल की परीक्षा में सूबे में सातवीं रैंक हासिल कर हर्षिता शर्मा ने अपने गांव परशुराम को हर्ष से झूमने का अवसर दे दिया। जिले के पिछड़े इलाके की बेटी की सफलता पर समूचा गांव गदगद है। ग्राम रोजगार सेवक पिता शिवकुमार शर्मा का तो पूछना ही नहीं है। उन्होंने खुद उच्च शिक्षा हासिल न कर पाने की कमी बच्चों से पूरी कराने का जो ख्वाब देखा उसे आज छोटी बिटिया ने पूरा तो किया ही, समूचे यूपी में नाम रोशन कर दिया। उनकी बिटिया चिकित्सक बनकर आमजन की सेवा करना चाहती है तो उन्होंने भी उसका लक्ष्य पूरा कराने की ठान ली है। 
बड़ी बहन कर चुकी है बीफार्मा 
हर्षिता शर्मा मधुबन तहसील क्षेत्र के परशुरामपुर गांव निवासी रोजगार सेवक शिवकुमार शर्मा व सुमन शर्मा की पुत्री है। वह अपने पिता के तीन संतानों में सबसे छोटी है। सबसे बड़ी बहन सुष्मिता शर्मा बीफार्मा करने के बाद बीएससी कर रही है। सुष्मिता से छोटा उसका भाई रतनसेन शर्मा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से सम्बद्ध ईश्वरचंद डिग्री कालेज से बीएससी करने के साथ ही सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा है। 
तीन भाइयों का है संयुक्त परिवार
हर्षिता के पिता शिवकुमार शर्मा तीन भाई हैं। तीनों भाइयों का परिवार एक साथ रहता है। शिवकुमार को मिलने वाले दस हजार मानदेय, दो बीघा खेती से होने वाले अन्न व मधुबन में शर्मा आफसेट प्रिंटिग प्रेस से होने वाली आय पर पूरे परिवार का पालन-पोषण निर्भर है। इसी इनकम से तीनों भाइयों ने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने की ठान रखी है। हर्षिता के पिता शिवकुमार ने बुलंद आवाज से बताया कि वह खुद इंटरमीडिएट तक पढ़े हैं। आगे की शिक्षा हासिल न कर पाने का उन्हें मलाल रहता है। उन्होंने शिक्षा का मोल समझते हुए यह कमी बच्चों से पूरी कराने की ठानी। उनके परिवार ने निश्चय किया है कि एक टाइम भोजन नहीं करेंगे, लेकिन बच्चों को पढ़ाएंगे जरुर।
बोर्ड परीक्षा का नहीं लगा डर  
हर्षिता सुभागी देवी इंटरमीडिएट कालेज मधुबन की 10वीं की छात्रा है। उसने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता व गुरुजनों को दिया। उसने बुलंद आवाज से अपना लक्ष्य साझा करते हुए कहा कि वह डाक्टर बनना चाहती है। पढ़ाई के बाबत कहा कि घर-परिवार से लेकर कालेज तक उसे तन-मन से पढ़ने को प्रेरित किया जाता रहा है। उसने पढ़ने को मिले समय का सदुपयोग किया। एक सवाल के जवाब में उसने बताया कि जीवन में पहली बार बोर्ड की परीक्षा में शामिल होते समय उसे कोई भय नहीं लगा। उसके कालेज के पूर्व के छात्र-छात्राएं भी यूपी में स्थान लाते रहे हैं। गुरुजन मेधावी छात्रों को उसी लिहाज से तैयारी भी कराते हैं। इस परीक्षा में भी पिछली कक्षाओं की तरह ही उसने सामान्य ढंग से हिस्सा लिया।   



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