प्रभाव देख दोस्ती का चलन बन रहा अवसाद का कारण 

28 May 2022

-पहले पड़ोसी होते थे खास दोस्त, दुःख व विपत्ति में करते थे हस्तक्षेप
-अब पद, रुतबा देखकर दोस्त बनने व बनाने का चल रहा सिलसिला 

अर्चना उपाध्याय 
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मऊ :
पहले पड़ोसी व खास दोस्त घर के सदस्य होते थे। वह हम सबकी कमी, दुःख, समस्या, विपत्ति, विवाद में हस्तक्षेप कर निपटाते थे। आज लोग पद, रुतबा, प्रभाव देखकर दोस्ती बनाते भी हैं और दोस्त बनते भी हैं। परिणामतः अकेलापन, अवसाद, बीमारी व लाचारी है। मतलब अगर आप फलां सर हैं या सर के पीए, स्टेनो, बाबू या फलां काम करा देने लायक हैं तो ठीक वर्ना बेकार हैं। 
अकेले पड़ने वाले बुजुर्गों की हत्याएं चिंतनीय 
जमीन, जायदाद, नाले, पड़ोहे का विवाद पहले भी था।  गलत-सही दिखते ही लोग लड़के-लड़कियों पर सख्ती से बिगड़ते थे। आए दिन अकेले पड़ने वाले बुजुर्गों की हत्या खबर में है। काश हम पहले वाला माहौल पैदा करें। लोगों से मिलने-संवाद करने का वक्त निकालें। मशीनी पढ़ाई ने आज की पीढ़ी को ऐसी मशीन बना दिया है कि उन्हें जिम्मेदारी बोझ लगने लगी है। वैसे इसके 99 प्रतिशत आरोपी हम सब हैं। 
बच्चों की शादी में सब मिलकर जुटाते थे दूध 
पहले गांव में कोई भी बगल के घर में आग मांगने जाता था। मेहमान आने पर पड़ोस से सब्जी, दाल, दूध सहित बहुत कुछ  पहुंचा दिया जाता था। बच्चों की शादी में दूध-दही सारे लोग मिलके पहुंचाते थे। रुपया से लेकर वाहन तक आपस में उपलब्ध था। अब हमारे परीचित हैं वो बात करेंगे तो लगातार बताएंगे कि कितने जज, कितने अफसर, कितने काम लायक कर्मचारी उनके भईया-बहन जैसे हैं। अब बताइए ऐसे मशीनी मानव कैसे आपके खास बनेंगे। 
जड़ में मट्ठा डालने की प्रवृत्ति घातक  
एक हैं वो मौका मिलते ही आपके जड़ में ऐसा मट्ठा डालेंगे कि  आप पनप न सकें। भई जो नोट कमाने की मशीन हैं उनमें तो संवेदनशीलता होगी ही नहीं, पर जो सामाजिक-व्यावहारिक हैं उनको तो आपस में जुड़ना चाहिए। किस बात के बड़े हैं हम-आप? नंगे आए हैं, नंगे ही जाना है यही औकात है। बस सद्गुण और व्यवहार ही तो जिन्दा रहता है। अंत में हमारी लोगों से अपील है कि राजनैतिक उन्माद में पारिवारिक-सामाजिक गंभीरता को हल्के में न लें। (यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक मऊ जिले की सोशल एक्टिविस्ट हैं।) 
 



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