मऊ के लाल : हॉकी ने रश्मि सिंह को दुनिया भर में दिलाई ख्याति 

01 May 2022

---बुलंद आवाज विशेष---
-भारतीय महिला टीम का रह चुकी हैं हिस्सा, आस्ट्रेलिया व जर्मनी में खेले हैं मैच
-खेल देख सेंट्रल रेलवे के अफसरों ने दे दी नौकरी, मुंबई में टीसी पद पर हैं तैनात
-बेटी को बाहर खेलने भेजे या न भेजें, इस परिस्थिति से गुजर हासिल की सफलता
-बास्केटबाल खिलाड़ी पंकज सिंह के रुप में मिला जीवनसाथी, मिलता है सपोर्ट 

बृजेश यादव 
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मऊ : बुलंद आवाज
के साप्ताहिक कालम मऊ के लाल में आज हम आपको परिचित करा रहे हैं रश्मि सिंह से। रश्मि वह शख्सियत हैं जिन्होंने हॉकी को अपनाया तो हॉकी ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई। भारतीय महिला हाकी टीम की खिलाड़ी रह चुकी रश्मि के नाम हिंदुस्तान की तरफ से आस्ट्रेलिया और जर्मनी में अंतर्राष्ट्रीय मैच खेलने का रिकार्ड है। रश्मि का शानदार खेल देख सेंट्रल रेलवे ने पल भर में ही नौकरी दे दी। वह मुंबई में टीसी (टिकट कलेक्टर) पद पर तैनात हैं। खेल ने कैरियर तो संवारा ही बेहतर परिवार की बहू भी बना दिया। देश के बास्केटबाल के मशहूर खिलाड़ी पंकज सिंह के रुप में उन्हें जीवनसाथी मिला। पति व ससुराल के लोगों का भरपूर सपोर्ट मिलता है। सबसे बड़ी बात यह रही कि 20 साल पहले हॉकी में रुचि लेने वाली रश्मि उस विषम परिस्थिति से निकलकर सफल हुईं, जब परिवार के लोग यह सोचते थे कि बेटी को बाहर खेलने के लिये भेजें या न भेजें। दो बार तो कुछ दिनों के लिये वह मायूस होकर घर भी बैठ गईं थी। 
2011 में इंडिया कैंप के लिये हुई सलेक्ट 
रश्मि सिंह ने 2011 में रांची में हो रहे नेशनल गेम में हिस्सा लिया था। यहीं पर उनका सलेक्शन इंडिया कैंप के लिये हुआ और वह भारतीय टीम का हिस्सा हो गईं। उन्होंने भारतीय महिला हाकी टीम में रहते हुए देश से बाहर पहला दौरा 2011 में ही किया। फार्वड लेफ्ट आउट की खिलाड़ी रश्मि ने देश की टीम से आस्ट्रेलिया में टेस्ट मैच खेला। इसके बाद तीन टीमों के बीच थ्री नेशन मैच हुआ। उसमें भारतीय टीम दूसरे नंबर पर रही। इसके बाद अगला दौरा भारतीय टीम के सदस्य के रुप में 2013 में हालैंड में हुआ। यहां टेस्ट मैच को टीम ने क्वालीफाई किया। इसके अलावा मेजर ध्यान चंद स्टेडियम में 2014 में हुए ओलंपिक क्वालीफाई मैच में जीत हासिल की थी। 
यूपी का करती हैं प्रतिनिधित्व 
रश्मि भले ही सेंट्रल रेलवे में खेल कोटा से नौकरी हासिल की हैं, लेकिन वह देश में होने वाले मैचेज में अपने प्रांत यूपी का ही प्रतिनिधित्व करती हैं। वह अब तक तीन स्टेट सीनियर, सात जूनियर व चार सब जूनियर मैचों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं। वर्ष 2016 में नेशनल गेम में चोट लगने के बाद राष्ट्रीय टीम से हटने के बाद आज भी वह उत्तर प्रदेश की ओर से ही खेलती हैं। महाराष्ट्र की तरफ से अब तक वह मात्र एक मैच खेली हैं। 
पहले थे नाराज, अब करते हैं नाज 
रश्मि सिंह का जन्म रतनपुरा ब्लाक क्षेत्र के अइलख इमिलिया गांव में हुआ है। वह रामअवलंब सिंह उर्फ मुन्ना सिंह की चार संतानों (तीन बेटियां, एक बेटा) में तीसरे नंबर पर हैं। वह तीन बहनों में सबसे छोटी हैं। उनसे छोटा उनका भाई है। रश्मि का लड़की होकर हॉकी खेलना उनके गांव-जवार को नागवार लगता था, लेकिन जब राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बनीं उसके बाद से उनका गांव उन पर नाज करता है।

मां के साथ रहीं मऊ ब्रह्स्थान 
रश्मि के पिताजी अइलख इमिलया गांव पर रहते थे, लेकिन उनका बचपन अपनी मां के साथ जिला मुख्यालय पर ब्रह्मस्थान मुहल्ले में बीता। उनकी मां कमलावती सिंह रतनपुरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर स्टाफ नर्स के रुप में तैनात थीं। उन्हें जिला अस्पताल में सम्बद्ध किया गया था। ऐसे में वह रश्मि को लेकर ब्रह्मस्थान में किराये के कमरे में रहती थीं।
बिन बताये सहेली संग चली गई स्टेडियम 
रश्मि की प्रारंभिक शिक्षा ब्रह्मस्थान मुहल्ले में स्थित सरस्वती विद्या मंदिर से हुई। कक्षा एक से पांच तक यहां पढ़ने के बाद उन्होंने आजाद हिंद इंटर कालेज निजामुद्दीनपुरा में दाखिल लिया। यहां कक्षा छह से नौ तक पढ़ाई की। वर्ष 2002 में वह आजाद हिंद इंटर कालेज में कक्षा छह में पढ़ रही थीं। वह कालेज में होने वाले दौड़ आदि प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती थीं। उनकी दौड़ काफी अच्छी थी। प्रियंका दीक्षित नामक उनकी सहेली पढ़ाई के बाद बलिया मोड़ स्थित डा.भीम राव अंबेडकर स्पोर्ट्स स्टेडियम में हॉकी की प्रैक्टिस करने जाती थी। वह रश्मि की दौड़ से उसके हॉकी खिलाड़ी होने की पहचान की थी। उसने एक दिन रश्मि से भी चलने को कहा तो स्कूल से छुट्टी होने के बाद वह अपनी मां को बिना बताये सीधे स्टेडियम चली गई थीं। 
हॉकी से हो गया प्यार, खेलना हुआ दुश्वार 
स्टेडियम में जाने के बाद अभ्यास में हिस्सा लेते ही उन्हें हॉकी से प्यार हो गया। कोच ओमेंद्र सिंह ने रश्मि की दौड़-भाग देख उसके काफी आगे जाने का अनुमान लगा लिया था। डेढ़ साल की कड़ी प्रैक्टिस में वह काफी दक्ष खिलाड़ी हो गईं। मऊ स्टेडियम तक तो अभ्यास करने जाना ठीक रहा, लेकिन 2004 में लखनऊ हास्टल के लिये ट्रायल में जाने की बात आई तो घर-परिवार में दुश्वारियां सामने आ गईं। गंवई पिता और माता महज 13 साल की उम्र में बेटी की सुरक्षा को लेकर बाहर खेलने भेजने को तैयार नहीं दिखे। ऐसे में रश्मि ने स्टेडियम जाना भी बंद कर दिया। 
ओमेंद्र सिंह मां-बाप को समझाकर ले गये ट्रायल में 
रश्मि ने बुलंद आवाज से बताया कि उनके स्टेडियम न जाने पर कोच आमेंद्र सिंह सर उनके घर आये। सारा माजरा समझने के बाद उन्होंने मां-बाप को काफी समझाया। उसके अच्छी खिलाड़ी होने और खेल से भी कैरियर बनने की बात रखते हुए खुद अपने साथ लखनऊ ट्रायल में ले गये। ट्रायल में जाते समय रश्मि ने मान लिया था कि यह उसके लिये आखिरी मौका है। उसने अपना बेहतर परफार्मेंस दिया और लोकल (जिलों से) चयनित हुईं तीन खिलाड़ियों में वह उनकी फर्स्ट पोजीशन थी। 
अंडर 16 में हास्टल के लिये चयन 
वर्ष 2004 में लखनऊ में हुए ट्रायल में रश्मि सिंह का चयन 16वर्ष की आयु की खिलाड़ी के रुप में केडी सिंह बाबू स्टेडियम के हास्टल के लिये चयन हो गया। इसके बाद तो सुबह से लेकर देर रात तक हॉकी खिलाड़ी की दिनचर्या हो गई। हाकी खेलते हुए रश्मि ने करामत हुसैन गर्ल्स इंटर कालेज निशातगंज लखनऊ से हाईस्कूल व इंटरमीडिएट उत्तीर्ण किया। लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उनका सलेक्शन यूपी टीम के लिए भी हो गया। 
हास्टल से भी आकर बैठ गई घर 
रश्मि के जीवन में दोबारा भी ऐसा पल आया जब लगा कि अब हॉकी से सदा के लिए साथ छूट जाएगा। लखनऊ हास्टल में से खेलते हुए तीन-चार साल हो चुके थे। घरवालों को लगा कि इस क्षेत्र में उसका कैरियर नहीं है। गांव के लोग भी तरह-तरह की आशंका व्यक्त करते थे। इसके बाद वह हास्टल छोड़कर घर आकर बैठ गईं। यह जानकारी होते ही कोच ओमेंद्र सिंह ने फिर गुरु का दायित्व निभाया और परिवार वालों को समझाकर फिर से उसका मार्ग प्रशस्त किया। घर-परिवार वालों का कलेजा तब गर्व से चौड़ा हो गया जब 2011 में नेशनल गेम खेलने रांची गई रश्मि का सलेक्शन इंडिया कैंप के लिये हो गया। 
सौंदर्या एंडाला ने पूछा रेलवे ज्वाइन करोगी  
गांव की बिटिया रश्मि सिंह का सलेक्शन इंडिया टीम में हो चुका था। टीम में शामिल सौंदर्या एंडाला उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी। रश्मि का मुंबई में खेल देख सेंट्रल रेलवे के अफसरों ने रेलवे में उसे खेल कोटे से नौकरी देकर अपनी खिलाड़ी बनाने का निर्णय किया। यह जानकारी सौंदर्या एंडाला को हुई तो उसने फरवरी 2013 में रश्मि से पूछा कि सेंट्रल रेलवे की नौकरी ज्वाइन करोगी। रश्मि ने हां कहा तो अगले दिन मुंबई में रेलवे के अधिकारियों के यहां जाकर उसका सर्टिफिकेट आदि जमा हुआ। विभागीय फार्मेल्टी पूरी करने के बाद उसे उसी माह नियुक्ति पत्र दे दिया गया और रश्मि बन गईं टिकट कलेक्टर। उसके नौकरी पाने के बाद घर वालों की खुशी का ठिकाना नहीं था। गांव के लोग भी गर्व से अपनी बेटी बताते नहीं थकते। 
2018 में लिये सात फेरे 
भारतीय हॉकी टीम की तरफ से खेलते हुए देश-दुनिया में रश्मि की हॉकी से पहचान बन चुकी थी। उधर वाराणसी के रहने वाले पंकज कुमार सिंह बास्केटबाल के मशहूर खिलाड़ी बन चुके थे। वह स्कूल इंडिया की तरफ से विदेशों में भी बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे। रश्मि सिंह व पंकज ने वर्ष 2018 में सात फेरे लेकर सदा-सदा के लिये एक-दूजे के हो गये। रश्मि के लिये अच्छा यह रहा कि उनके सास-ससुर खिलाड़ी के ही मां-बाप निकले। ऐसे में वह लोग खेल की महत्ता व खिलाड़ियों की व्यस्तता को समझने वाले हैं। पंकज सिंह भी खेल कोटा से रेलवे में सीनियर क्लर्क हैं। उनकी पोस्टिंग इस समय पूर्वात्तर रेलवे के मंडुआडीह में है। रश्मि की दो साल की बेटी रुदांशी सिंह की देख-रेख उनके सास-ससुर बखूबी करते हैं। 
सोचा भी नहीं था छू लूंगी आसमान 
रश्मि सिंह ने बुलंद आवाज के एक सवाल के जवाब में कहा कि बाल्यावस्था में हॉकी खेलना शुरु किया तो सोचा भी नहीं था कि ख्वाब सरीखा आसमान छूने का अवसर मिलेगा। पिछड़े इलाके से ताल्लुक रखने के नाते उनकी सुरक्षा को लेकर अज्ञात भय से ग्रस्त मां-बाप का बाहर खेलने जाने देने से मना करना उचित था। उन्होंने कहा कि आज मैं जो कुछ भी हूं उसका सारा श्रेय हमारे प्रारंभिक कोच ओमेंद्र सिंह सर को जाता है। अगर वह हमारे परिवार को मोटिवेट कर हमें आगे नहीं बढ़ने को प्रेरित नहीं करते तो फिर मैं भी सामान्य लड़कियों की तरह ही होकर रह जाती। उन्होंने कहा कि हमलोगों के समय का दौर दूसरा था। आज तो लोग बेटियों को भी आगे बढ़ने, पढ़ने, खेलने देने को तैयार हैं। हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि हमारी जन्मभूमि की बेटियां आने वाले दिनों में हमसे भी आगे जाएंगी। 
     
 



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