भारत में ग्रामीण अंचलों का ही भविष्य

23 Apr 2022

-समाज सुधार में फार्म हाउसों का नहीं है कोई रोल
-अमीरों का बना स्टेटस सिंबल, उजागर होते हैं खेल

डॉ. गंगासागर सिंह

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मऊ : फार्म हाउस की लोकप्रियता अमीरों में बढ़ती जा रही है। गांवों के सुरम्य, प्रदूषणरहित वातावरण से प्रभावित एवं शहरों के शोरगुलयुक्त आबादी से दूर फार्म हाउस अमीरों का स्टेटस सिम्बल बनते जा रहे हैं। यहाँ तक कि जिनके पास ज्यादा पूंजी नहीं है उन्हें मासिक/सलाना भाड़े पर भी फार्म हाउस उपलब्ध हैं। मध्यमवर्गीय परिवार इन फार्म हाउसों को एक दिन के लिए भाड़े पर लेकर शादी-विवाह, बर्थ डे एवं एनिवर्सरी पार्टी कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि इन फार्म हाउसों का समाज सुधार में कोई योगदान नहीं है। इनमें क्या-क्या खेल होते हैं, वह समय-समय पर उजागर होते रहते हैं। भारत देश में ग्रामीण अंचलों में ही भविष्य सुरक्षित है यह लोगों को समझना व समझाना होगा।

न करें बंटाधार

फार्म हाउस नई जनरेशन के लिए एक क्रेज बन चुका है। विडम्बना यह है कि गांववासी अपना फार्म हाउस बेचकर शहरों की सकरी गलियों में कंक्रीट के जंगल (ईंट के मकानों की घनी बस्तियां)  में जाकर बस रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि एक जन जागरण क्रान्ति पैदा कर गाम्य वासियों को समझाया जाय कि भविष्य ग्रामीण अंचलों का ही है। इस संक्रमण काल में बहक कर गांव की अपनी जमीन पर दूसरे का फार्म हाउस बनवाकर कुछ पैसे के टुकड़ों के लिए पूर्वजों की इज्जत का बन्टाधार न करें। 

जनांदोलन को दें मूर्तरूप
दूसरा सामाजिक पहलू यह है कि धनाढ्य सेठों द्वारा निर्मित पांच सितारा फार्म हाउसों के अंदर क्या हो रहा है उसके सैंपल उदाहरण समय- समय पर उजागर हो रहे हैं। अंततः मैं गाँवों से पलायित बुद्धिजीवी, क्रीमीलेयर से अनुरोध कर रहा हूँ कि चलो गांव की ओर   नामक जन आंदोलन को मूर्त रूप देने का कष्ट करें।(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक इंडियन मेडिकल एसोसिएशन मऊ के अध्यक्ष हैं।)



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