मऊ के लाल : माफियाओं के खिलाफ खुलकर चली आनंद राय की कलम 

16 Jan 2022

---बुलंद आवाज विशेष---
-गोरखपुर में उस समय संभाली क्राइम रिपोर्टिंग की कमान जब आए दिन तड़तड़ाती थी गोलियां
-पुलिस की कहानी छापने की बदल दी परिपाटी, अपराधियों की मांद में घुसकर ले आने लगे खबर
-जरायम की दुनिया में शिकागो कही जाने लगी गोरखनाथ की नगरी में कई खोजी खबरों से चौंकाया
-1995 में हुई ब्लाक प्रमुख सुरेंद्र सिंह की हत्या के बाद महत्वपूर्ण क्लू जुटाकर छापते रहे फाओलप
-उत्तर प्रदेश के साथ ही राजस्थान, पश्चिम बंगाल व मध्यप्रदेश में चुनाव के समय कर चुके हैं ग्राउंड रिपोर्ट  

बृजेश यादव 
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मऊ :
अपने साप्ताहिक कालम मऊ के लाल में आज हम आपको परिचित कराने जा रहे हैं कलम के सिपाही आनंद राय से। आनंद राय वह शख्सियत हैं जो गोरखपुर के माफियाओं से रत्ती भर भी भयभीत नहीं हुए, उनके खिलाफ खुलकर उनकी कलम आग उगलती रही। वह भी ऐसे समय में जब गोरखनाथ की नगरी की तुलना जरायम की दुनिया में अमेरिका के कुख्यात शहर शिकागो से की जाने लगी थी। आए दिन कहीं न कहीं गोलियों की तड़तड़ाहट से जिला थर्रा उठता था। भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यूपी में अत्याधुनिक हथियार एके 47 का पहला प्रयोग गोरखपुर में ही कुख्यात श्रीप्रकाश शुक्ला द्वारा किया गया था। ढाई दशक पहले गोरखपुर में दैनिक जागरण में क्राइम रिपोर्टिंग की कमान संभालने वाले आनंद ने अखबारों में पुलिस द्वारा गढ़ी जाने वाली कहानी प्रकाशित करने की परिपाटी बदल दी। वह निधड़क अपराधियों की मांद में घुसकर खबरें लाने लगे। अपराध जगत की उनकी कई खोजी खबरों ने सबको चौंकाया भी। उन्हें प्रसिद्धी तो क्राइम रिपोर्टिंग ने ही दिलाई, लेकिन राजनीति की खबरों पर भी उनका बेहतर कमांड था। यूपी, राजस्थान, पश्चिम बंगाल व मध्यप्रदेश में उनकी ग्राउंड रिपोर्टिंग काफी दमदार रही। 
दबावमुक्त खबरें लिखने का बनाया माहौल 
बात जून 1995 की है। 27 साल के युवा आनंद राय का गोरखपुर दैनिक जागरण में बतौर रिपोर्टर सलेक्शन हुआ। उन्हें वहां पहुंचते ही क्राइम रिपोर्टिंग का प्रभार दे दिया गया। उनकी ज्वाइनिंग से कुछ दिन पहले पिपरौली के ब्लाक प्रमुख सुरेंद्र सिंह हत्याकांड से गोरखपुर गरम था। लोग इस हत्याकांड के बारे में अधिक से अधिक जानने के लिये रोज अखबारों को खोज-खोज कर पढ़ते थे। युवा जोश से लबरेज आनंद ने इस खबर की तह तक जाकर रिपोर्टिंग करने की ठानी। कई दिनों तक लिखे गये फालोअप में उन्होंने घटना के पूर्व से लेकर बाद तक के बहुत सारे राज सामने लाकर रख दिया। इस घटना में सटीक रिपोर्टिंग से उन्हें सराहना मिली तो उनका मनोबल भी बढ़ता गया। माफियाओं की दखलंदाजी से डरे-सहमे माहौल में रिपोर्टिंग करने वाले अखबारनवीशों को साहस मिला और वह भी दबावमुक्त होकर खुलकर खबरें लिखने लगे। 
विधायक हत्याकांड में झुठला दी पुलिस की दलील 
आनंद राय को क्राइम रिपोर्टिंग करते अभी नौ माह भी नहीं बीते थे कि 25 मार्च 1996 को विधायक ओमप्रकाश पासवान की हत्या कर दी गई। इस हत्याकांड में पुलिस की काफी किरकिरी हुई। इसकी एक प्रमुख वजह यह भी बनी कि विधायक की हत्या करने की माफिया की योजना की खबर आनंद राय घटना से पहले लिखकर आगाह भी कर चुके थे। हत्या को अंजाम देने वाले अपराधियों का नाम खुलने के बाद भी पकड़ने में नाकाम पुलिस अफसरों (आइजी-डीआइजी) ने प्रेस-कांफ्रेंस बुलाई। उसमें दलील दिया कि विधायक पासवान के हत्यारे पड़ोसी देश नेपाल में छिपे हैं। आनंद राय को छोड़ सारे कलमकारों ने अपने अखबारों में पुलिस की दलील व दावे को प्रकाशित किया। अगले दिन जब अखबार छपकर मार्केट में आया तो दैनिक जागरण में पहले पन्ने पर छपी पासवान के हत्यारे बिहार में गिरफ्तार खबर ने पुलिस अफसरों की दलील ही नहीं झुठलाई, समूची पुलिसिंग को कठघरे में खड़ा कर दिया। जिन अपराधियों को पुलिस अफसर नेपाल में छिपे होने का दावा कर रहे थे, वह बिहार में अपना नाम बदलकर जुआ खेलते हुए हुए पकड़े गये थे। इस खबर ने आनंद राय की ख्याति में चार चांद लगा दिया। माफिया गिरोह व समूची गोरखपुर पुलिस को इस खबर ने इतना चौंकाया कि वह हर दिन जगते ही दैनिक जागरण खोजकर इसलिये पढ़ने लगे कि न जाने आनंद ने आज कौन सी कड़वी सच्चाई छाप दी होगी। 
श्रीप्रकाश शुक्ला ने कर दी पूर्व विधायक विरेंद्र प्रताप शाही की हत्या 
विधायक ओमप्रकाश पासवान की हत्या के साल भर बाद 30 मार्च 1997 को पूर्व विधायक विरेंद्र प्रताप शाही की हत्या कर दी गई। यह हत्या उसी कुख्यात श्रीप्रकाश शुक्ला ने की थी, जो बिहार के मंत्री की हत्या के बाद यूपी के सीएम कल्याण सिंह की भी सुपारी ले लिया था। श्रीप्रकाश शुक्ला कितना बड़ा दुस्साहसिक माफिया था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता था कि कल्याण सिंह की सुपारी लेने के बाद उसको ही ठिकाने लगाने के लिये यूपी में एसटीएफ का गठन किया गया। श्रीप्रकाश शुक्ला के द्वारा ही यूपी में पहली बार एके 47 का प्रयोग किया गया था। विरेंद्र प्रताप शाही हत्याकांड मेें पुलिस की जांच अलग चलती रही और आनंद राय की परत-दर-परत उधेड़ती लेखनी विवेचकों को आईना दिखाती रही। इस घटना के बाद की खबरों का संकलन करने उन्हें श्रीप्रकाश शुक्ला के विरोधी आपराधिक गिरोह की मांद तक जाना पड़ा था। निर्भीक होकर की गई रिपोर्टिंग से आनंद राय की ख्याति तो बढ़ी ही, आम जनमानस में भी उन्हें परफैक्ट पत्रकार की संज्ञा दी जाने लगी। 
अपराधियों की सूचनाओं की करते थे पुष्टि 
अपराध जगत की खबरों को निडर होकर गहराई तक जाकर लिखने के आनंद राय के साहस को जानने के बाद अपराधी भी उन तक सूचनाएं पहुंचवाने लगे। मोबाइल का युग (उपलब्धता) न होने के चलते श्रीप्रकाश शुक्ला व उसके विरोधी गैंग वाले कभी दैनिक जागरण दफ्तर के टेलीफोन पर काल करके तो कभी एक पीसीओ पर आनंद राय के लिये सूचना छोड़ देते। कोई सूचना किसी बड़ी घटना को अंजाम देने से पहले की होती थी तो कोई हत्याकांड को अंजाम दे चुके अपराधियों के बारे में। आनंद के परफैक्ट क्राइम रिपोर्टिंग की यह खासियत रही कि जरायम जगत की सूचनाएं अपराधी, आम आदमी या पुलिस का खुफिया तंत्र दे, वह अपने नेटवर्क से पहले उसकी पुष्टि करते थे, फिर प्रकाशित करते थे। यही वजह रही कि उनकी सारी खबरें सच या सच के करीब होती थीं। बुलंद आवाज के एक सवाल के जवाब में आनंद राय ने बताया कि माफिया अपने खिलाफ अंदर की खबर छपने पर तिलमिला उठते थे। अखबार के दफ्तर में दुर्दांत श्रीप्रकाश शुक्ला व अन्य अपराधियों का फोन आता तो साथी पत्रकार भयभीत भी हो जाते थे, लेकिन उन्हें कभी डर नहीं लगा। इतना ही नहीं खबर की खातिर वह बड़े अपराधियों से मिलने उनकी मांद तक जाने से भी कभी नहीं हिचके। हां इतना जरुर रहा कि अपराधियों की सूचनाओं को उन्होंने खबरों में ही प्रयोग किया, निजी स्वार्थ में कभी उपयोग नहीं किया। वह न तो अपराधियों का एजेंडा बने और न ही पुलिस के टूल (औजार)।   
लखनऊ पहुंचते ही एनआरएचएम घोटाला के खोले कई राज 
गोरखपुर में डेढ़ दशक की दमदार रिपोर्टिंग के बाद दैनिक जागरण परिवार ने आनंद राय को अप्रैल 2010 में राजधानी बुला लिया। लखनऊ स्टेट ब्यूरो में चार माह तक यूपी डेस्क का अनुभव लेने के बाद उन्हें अपराध व गृह विभाग की बीट का जिम्मा सौंप दिया गया। उस समय चर्चा में था एनआरएचएम घोटाला। इस घोटाले की जांच सीबीआइ कर रही थी। सीबीआइ के अंदरखाने की खबरों व तह तक घुसकर साक्ष्य संकलन कर बकायदा सीरीज चलाई। घोटाले में संलिप्त तत्कालीन बसपा सरकार के कई मंत्रियों व अफसरों की पोल खोली, जिन्हें सीबीआइ ने गिरफ्तार भी किया। इस घोटाले की विस्फोटक खबरों ने उन्हें पूरे प्रदेश में पहचान दिला दी। 
बांदा व निघासन दुष्कर्म कांड में मौके तक जाकर रिपोर्टिंग 
मायावती की सरकार में बहुचर्चित बांदा दुष्कर्म कांड व लखीमपुर के निघासन में रेप के बाद हत्याकांड की घटनास्थल तक जाकर रिपोर्टिंग की। सच्चाई बयां करती खबरों को निरंतर फ्लैश करने का नतीजा रहा कि बांदा दुष्कर्म कांड में बसपा के विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी गिरफ्तार कर जेल भेजे गये। निघासन कांड में पुलिस महकमे के क्षेत्राधिकारी को आरोपी बनाया गया। पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने व दोषियों को बेनकाब करने के आखिरी हद तक इन दोनों घटनाओं की खबरों की चलाई गई सीरीज से दैनिक जागरण के साथ-साथ आनंद राय को भी लोकप्रियता मिली। 
यूपी से लेकर कई राज्यों तक राजनीतिक कवरेज 
गोरखपुर में क्राइम रिपोर्टिंग के साथ आनंद राय विधानसभा व लोकसभा चुनावों के समय राजनीतिक कवरेज भी करते। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की यात्रा की दो बार उन्होंने रिपोर्टिंग की। लखनऊ पहुंचने के बाद भी 2010 से 2012 तक के माया सरकार के बदलाव के दौर में युवाओं के साथ क्रांति रथ लेकर निकले अखिलेश यादव की मुहिम तक पर उन्होंने खबरें लिखीं। 2012 में सपा की सरकार बनने के बाद पांच साल तक भारतीय जनता पार्टी के अंदर व बाहर की कई रोचक खबरों की प्रस्तुति दी। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय नरेंद्र मोदी की एनसीआर छोड़ हर जगह की रैलियों का कवरेज किया। 2018 में दैनिक जागरण के लिये राजस्थान जाकर चुनाव की ग्राउंड रिपोर्टिंग की। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद अक्टूबर में दैनिक जागरण प्रबंधन ने उन्हें पश्चिम बंगाल में आने वाले समय में होने वाले चुनाव की कवरेज के लिये विशेषज्ञ के रुप में कोलकाता भेजा। वहां की राजनीतिक आबोहवा को भांप चार माह में कुछेक चर्चित खबरें लिखे। इसके बाद वर्ष 2020 में उनका तबादला मध्यप्रदेश कर दिया गया। विशेष संवाददाता के पद पर आसीन राय ने भोपाल में दैनिक जागरण समूह के ही अखबार नई दुनिया में राजनीतिक संपादक के रुप में कार्य शुरु किया। 
कोरोना की भयावहता से 26 साल बाद छोड़ दिया जागरण समूह 
भोपाल में नई दुनिया में आनंद राय को राजनीतिक संपादक के रुप में कार्य करते हुए सात माह ही बीते थे कि कोरोना महामारी की शुरुआत हो गई। वहां पहले ही प्रकोप में लोगों की जान जाने लगी। नई दुनिया के दफ्तर की स्थिति यह हो गई कि आनंद व उनके संपादक को छोड़ सारे साथी कोरोना की चपेट में आ गये। उधर वह भोपाल में भले थे, पत्नी-बच्चे यूपी की राजधानी लखनऊ में। वहां की खबर जब परिवार के लोग जाने तो उनसे सबकुछ छोड़कर लखनऊ आने का अनुरोध करने लगे। बीवी-बच्चों का रोज अनुरोध व भोपाल में कोरोना के दिनोंदिन बढ़ते प्रकोप के चलते उन्होंने जागरण समूह को 26 साल बाद अलविदा कह दिया। लखनऊ आने के बाद उन्हें विशेष संवाददाता (स्पेशल करेस्पांडेंट) के पद पर ही देश की सबसे बड़ी न्यूज एजेंसियों में शुमार पीटीआइ (प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया) ने मौका दिया तो एक अक्टूबर 2020 से वहां जुड़ गये। वहां निरंतर लेखन का कार्य उनका अब भी जारी है। 
प्रेस क्लब के निर्विरोध रहे अध्यक्ष 
गोरखपुर में पत्रकारों को संगठित व सक्रिय करने में भी उनकी सक्रियता रही। उनकी सक्रियता व माफियाओं से भयमुक्त पत्रकारिता का माहौल पैदा करने का ही असर रहा कि गठन के बाद 1998 में पहली बार प्रेस क्लब का चुनाव हुआ। आनंद राय का कलमकारों पर प्रभाव इस कदर था कि उन्होंने भी उस चुनाव में उपाध्यक्ष पद के लिये पर्चा भरा। उनके सामने आज अखबार के वरिष्ठ पत्रकार लड़ रहे थे। बावजूद इसके वह चुनाव जीत गये। देश के शीर्ष स्तर के पत्रकार रहे प्रभाष जोशी की मौजूदगी में शपथ ग्रहण समारोह हुआ। संगठन को लेकर वह इतने सक्रिय रहे कि डेढ़ साल बाद हुए अगले चुनाव में सभी कलमकारों ने उन्हें निर्विरोध अध्यक्ष चुन दिया। अपने अध्यक्ष रहते उन्होंने दिवंगत संपादक डा.सदाशिव द्विवेदी की स्मृति में प्रेस क्लब में लाइब्रेरी स्थापित कराई। गोरखपुर की पत्रकारिता में अहम योगदान देने वाले हिन्दुस्तान व जनसत्ता के लखनऊ के वरिष्ठ रिपोर्टर रह चुके स्वर्गीय जयप्रकाश शाही की स्मृति में सूचना कक्ष का लोकार्पण कराया। पत्रकारों के लिये इंटरनेट की सुविधाएं उपलब्ध कराई। अपने कार्यकाल का समापन पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से कराया। आनंद ने देश के कई नामचीन पत्रकारों की तमाम कृतियों का प्रकाशन भी कराया। मशहूर शायर राजेश सिंह बशर की कृति एक ही चेहरा का संपादन भी किया।
मानव तस्करी रोकने की मुहिम के बने हिस्सा 
गोरखपुर से नेपाल व देश के अन्य राज्यों में महिला व बच्चों की तस्करी के खिलाफ मुहिम का वह हिस्सा बने। गोरखपुर के तत्कालीन आइजी डा.रामलाल राम द्वारा शुरु किये गये अभियान के तहत वह अंतर्राष्ट्रीय मानव तस्करी रोकने के लिये नेपाल तक सेमिनार करने गये। नेपाल बार्डर के चेक पोस्टों पर चले पुलिस अभियान में सक्रिय रहे। गोरखपुर में 21 अक्टूबर 2003 को उनके द्वारा साहित्यिक गतिविधि पर की गई शानदार रिपोर्टिंग के लिये दैनिक जागरण नई दिल्ली संस्करण के प्रथम संपादक कमलेश्वर ने उन्हें बधाई पत्र भी भेजा था। कमलेश्वर ने 25 अक्टूबर 2003 को आनंद राय को लिखे पत्र में कहा कि तथ्यपरक, बेलाग और बेदाग, व्यापक सरोकारों से जुड़ी शानदार रिपोर्टिंग। आगे लिखा कि मुझे अंदाज नहीं था कि पूर्वी उत्तर प्रदेश इतना ज्यादा जीवंत और जागरुक है। इसका श्रेय आनंद राय व पत्रकार बिरादरी को है। 
अभिनय का भी रहा शौक 
पत्रकारिता में ख्याति पाने वाले आनंद राय को बचपन से अभिनय का भी शौक रहा। इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान विक्ट्री इंटर कालेज दोहरीघाट के स्थापना दिवस पर हुए समारोह में उन्हें नाटक में पहला पुरस्कार मिला। आनंद द्वारा लिखित नाटक जुल्म का बदला उनके गांव के युवक मंगल दल के कार्यकर्ताओं ने गांव में मंचित किया। दूरदर्शन व आकाशवाणी के कार्यक्रमों नियमित हिस्सा लेते रहने वाले आनंद राय ने गोरखपुर में रिपोर्टिंग के दौरान एक फिल्म में विलेन के रुप में इंस्पेक्टर का रोल भी अदा किया। शुरुआत में उस फिल्म का नाम रघुपति राघव राजाराम था। बाद में नाम बदलकर मुंबई वाली मुनिया कर दिया गया। यह फिल्म यूट्यूब पर आज भी मौजूद है। वह बताते हैं कि फिल्मों में उनका काम करना घर वालों को अच्छा नहीं लगा तो इस क्षेत्र में आगे नहीं बढ़े। हां यह जरुर रहा कि बहुत से फिल्म के कथाकारों को उन्होंने जरायम की दुनिया से संबंधित सामग्री उपलब्ध कराई। आनंद राय में मानवता भी कूट-कूटकर भरी है। एक वाक्या उन्हें आज भी याद है कि गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर एक बच्चे का पैर ट्रेन से कट गया था। उसकी मां की मौके पर ही मृत्यु हो चुकी थी। उनकी पहल पर समाजसेवी उमा सर्राफ ने बच्चे को गोद लिया। उसका लालन-पोषण व इलाज अपने बच्चों सरीखे कराया। आज उस बच्चे की बेहतर स्थिति देख उनके दिल को सकून मिलता है। 
कोरोली के रामनिवास राय के इकलौते पुत्र हैं आनंद 
52 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय मूलतः दोहरीघाट थाना क्षेत्र के कोरौली गांव के निवासी हैं, हालांकि उन्होंने 1970 में गोरखपुर में जन्म लिया। वह स्वर्गीय रामनिवास राय के इकलौते पुत्र हैं। उनसे छोटी एक बहन हैं। गोरखपुर में कारोबार कर रहे रामनिवास का साया आनंद राय के अल्पआयु में ही उठ गया। आनंद की कक्षा एक से 10वीं तक की शिक्षा गांव में स्थित श्री विंध्याचल राय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय (अब इंटर कालेज) में हुई। विक्ट्री इंटर कालेज दोहरीघाट से इंटरमीडिएट करने के बाद उन्होंने आजमगढ़ के मालटारी स्थित गांधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय से स्नातक किया। मऊ जिला मुख्यालय स्थित डीसीएसके पीजी कालेज से उन्होंने एमए किया। 
यूथ कांग्रेस के जिला महासचिव भी रहे
उच्च शिक्षा की शुरुआत के साथ वह राजनीति में भी दिलचस्पी लेने लगे। मऊ को जनपद का दर्जा दिलाने वाले विकास पुरुष स्व.कल्पनाथ राय के अति निकटस्थ हो गये। आनंद राय 1988 में आजमगढ़ जनपद के युवक कांग्रेस के पदाधिकारी बने। इसी दौरान 19 नवंबर 1988 को मऊ को जनपद का दर्जा मिला गया। इसके बाद उन्हें मऊ का यूथ कांग्रेस का जिला महासचिव बना दिया गया। उस समय उनके अध्यक्ष स्वर्गीय द्वारिकानाथ गुप्ता (बाद के वरिष्ठ पत्रकार) थे। आनंद खुद तो कभी छात्रसंघ का चुनाव नहीं लड़े, लेकिन छात्रसंघ के चुनावों में सक्रियता बनाये रखते थे। उन्होंने पूर्वांचल छात्र जागरण मंच गठित कर रखा था। वह 1992 तक जिले सहित आसपास के जिलों के डिग्री कालेजों में मंच से प्रत्याशी खड़ाकर छात्रसंघ चुनाव लड़ाते थे। 
18 साल की अवस्था में थाम ली कलम 
महज 18 साल की अवस्था में यूथ कांग्रेस की राजनीति के दौरान ही उन्होंने कलम थाम ली। उन्हें पत्रकार बनाने का श्रेय जाता है ज्ञानेश वर्मा को। उन्होंने इन्हें 1988 में लिखने को प्रेरित कर युवन टाइम्स अखबार का संवाददाता बना दिया। राजनीति करें या पत्रकारिता इसी उधेड़बुन में पड़कर लिखना-पढ़ना सीख रहे आनंद राय को 1992 में राष्ट्रीय सहारा अखबार में काम करने का अवसर मिल गया। लखनऊ यूनिट के गोरखपुर ब्यूरो के अंतर्गत आने वाले मऊ का इन्हें जिला रिपोर्टर बनाया गया। कोई भी काम पूरी तन्मयता व समर्पण से करने के आदी आनंद डेढ़ साल में बेहतर खबरें लिखने लगे। उसी दौरान उनकी लेखनी, प्रतिभा व जिम्मेदारी से कार्य करने की कार्यशैली के कायल मऊ से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र पूर्वांचल संदेश के तत्कालीन संपादक अर्जुन सिंह हो गये। उनके कहने पर वह पूर्वांचल संदेश में आ गये। अखबार की ही बिल्डिंग में दिन - रात रहकर वह एडिटोरियल प्रबंधन का पूरा कार्यभार देखने लगे। निरंतर नया सीखने की ललक लिये आनंद राय 1994 में पूर्वांचल संदेश छोड़कर लखनऊ के साप्ताहिक अखबार संडे मेल के पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रभारी बन गये। 25 मार्च 1995 को यह अखबार बंद हो गया तो उन्होंने बलिया के भरत भारती के साथ मिलकर बलिया से साप्ताहिक अखबार डॉन स्पेशलिस्ट निकाला। इस अखबार के लिये वह लखनऊ ब्यूरो देखते थे। डॉन स्पेशलिस्ट अखबार में तह तक जाकर उनकी छपने लगी खबरों का असर यह हुआ कि जून 1995 में दैनिक जागरण की गोरखपुर यूनिट में उन्हें खूंखार डॉनों के बीच रहकर रिपोर्टिंग करने का अवसर मिल गया। खबर के अंत में विभिन्न राजनेताओं के साथ रिपोर्टिंग के पल की कलमकार आनंद राय की कुछ तस्वीरें भी हैं।  



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