अनादिकाल तक अमर होकर दिलों पर राज करते हैं यह व्यक्ति

25 Nov 2021

-परायों पर दया करना दयावान मनुष्य का उत्कृष्ट चरित्र
-सभी इंसान हो जाएं दयालु तो स्वर्ग बन जाये पृथ्वीलोक
-दया, क्षमा, एकता, प्रेम की राह से सुधर सकता समाज

डा. गंगासागर सिंह
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मऊ : दया अर्थात् करूणा मनुष्य का सर्वाेच्च उत्कृष्ट गुण है। दयावान व्यक्ति सर्वगुण सम्पन्न स्वतः हो जाता है। दूसरे प्राणियों के कष्टों को देखकर, सुनकर एवं अनुभव कर द्रवित होकर तुरंत सहायता को हाथ बढ़ाना ही दया है। दया जैसे गुण का आधुनिकता के दौड़ में स्तर लगातार गिरता जा रहा है। आधुनिक सभ्यता में संस्कृति को भूलकर दूसरों की मजबूरी का अधिकांश व्यक्ति भयादोहन कर उपभोक्तावाद की मृगतृष्णा के साथ अंधेरी अंतहीन गलियों में भटकता हुआ इस पृथ्वीलोक को नर्क लोक बनाने पर तुला हुआ है।
रहीमदास का कथन सर्वभौतिक सत्य
रहिमन वे नर चुके, जो कहुं मांगन जाहिं। उनसे पहले वे मुयें, जिन मुख निकल नाहिं। दयावान हीन व्यक्ति पर रहीमदास का कथन सर्वभौमिक सत्य है। दयावान व्यक्ति दानवीर होते हैं। यशस्वी होकर लोगों के दिलों में अनादिकाल तक अमर रहते हैं। अपनों पर दया तो अधिकांश लोग करते हैं लेकिन पराये पर दया करना ही उत्कृष्ट दयावान का चरित्र होता है। अन्ततः मैं यही कहूंगा कि अगर मनुष्य दयावान हो जाए तो पृथ्वीलोक स्वर्गलोक बन जाएगा।
समस्याओं का त्वरित समाधान है क्षमा
क्षमा मनुष्य का ऐसा गुण है जो बहुत सी समस्याओं का त्वरित समाधान है। भविष्य में उत्पन्न होने वाली समस्याओं का भी समाधान है। इसमें दो व्यक्तियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पहला क्षमादान दाता एवं दूसरा क्षमादान याचक। क्षमा का महत्व इसी से सिद्ध होता है कि इसे पवित्र दान की श्रेणी में रखा गया है। गलती मनुष्य से स्वाभाविक तौर पर होती रहती है लेकिन समय रहते जितना जल्दी गलती का एहसास कर क्षमा मांग लिया जाए अच्छा रहता है। अन्यथा बहुत सी गलतफहमियां जन्म लेती हैं। आपसी रिश्ते में खाई पैदा होती जाती है। एक दिन ऐसी स्थिति आयेगी कि वापसी असंभव हो जाती है।
क्षमादान की भी होती है एक सीमा
वैसे ही हर व्यक्ति को चाहिए कि यथासंभव जल्द से जल्द क्षमायाचक को क्षमादान प्रदान कर अपना चित्त प्रसन्न कर लें एवं कुढ़न एवं क्रोध से मुक्ति प्राप्त कर लें। क्षमादान की भी एक सीमा होती है। जहां अपूर्णनीय क्षति एवं जानबूझकर अहित पहुंचाने के लिए गलती का स्वांग रचा गया हो ऐसे में मामला अक्षम्य हो जाता है। सबक के तौर पर कानूनतह दण्ड देना/दिलवाना अतिआवश्यक हो जाता है, अन्यथा एक सामाजिक बुराई पनपने लगेगी। अंततः आम जनमानस से आग्रह करता हूं कि यथासंभव त्वरित क्षमादान एवं क्षमायाचना समाज सुधार के लिए अतिआवश्यक है। यह बेहतरीन समाज निर्माण का पथ प्रदर्शक भी है।
एकता के डोर में बांधे रखती है संस्कृति
एकता सूत्र हर परिवार, समाज, वर्ग एवं राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोने की एक आदर्श आचार संहिता होती है। यह आचार संहिता है किसी परिवार, समाज, वर्ग एवं राष्ट्र की संस्कृति। संस्कृति, उस धागे के समान है जो माला के रंग बिरंगे फूलों को बांधे रखता है। अगर धागा टूट गया तो सभी सुन्दर फूल जमीन पर बिखर कर धूल धूसरित होकर नष्ट हो जाते हैं। वैसे ही संस्कृति के नष्ट होने से सभ्यता नष्ट हो जाती है। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति अतिप्राचीन सभ्यताओं में एक है। सभ्यता के साथ संस्कृति का विकास स्वतः शुरू हो जाता है। सभ्यता की गुणवत्ता को संस्कृति ही सतत सुधारती है। उस सभ्यता के हर व्यक्ति को अनुशासित एवं एकता की डोर में बांधे रहती है।
देश का ऐसे हुआ नैतिक पतन
गुलामी के एक हजार बर्षों में हमारी भारतीय संस्कृति को आततायियों ने नष्ट करने की भरपूर कोशिश की। बहुत हद तक सफल भी हुए। स्वतंत्रता के बाद के 75 वर्षों में भी हमारे देश के राजनीतिक कर्णधार, वोट बैंक की राजनीति एवं बहुमत की कठिन अंकगणित में उलझे रहे। किसी ने अपनी सांस्कृतिक विरासत के पुनरूत्थान का प्रयास नहीं किया। देश की दुर्दशा एवं नैतिक पतन का मुख्य कारण यही है। संचार क्रान्ति ने आधुनिक सभ्यता के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया लेकिन हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति को बहुत नुकसान पहुंचाया है।
संस्कृत के उत्थान के लिये नहीं हुए प्रयास
प्राचीन भारतीय संस्कृति का संबंध संस्कृत भाषा से भी है। हमारे पुराण, उपनिषद, गीता एवं अन्य प्राचीन ग्रंथ संस्कृत भाषा में हैं। बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है इस भाषा को स्वतंत्रता के बाद कोई प्रोत्साहन नहीं दिया गया, बल्कि उस समय के अधिकांश संस्कृत विद्यालयों को बन्द कर दिया गया। हमारी अधिकांश जनता संस्कृत भाषा के लिए अनपढ है। भारतवर्ष विश्व का एक अनोखा देश है जहां अनेक स्थानीय भाषाएं हैं। भाषा भी किसी राष्ट्र को एकता सूत्र में बाधने का एक अचूक साधन है।इस क्षेत्र में भी एक राष्ट्रीय भाषा के विकास के लिए ठोस कदम किसी सरकार ने 75 वर्षों में नहीं किया।
मूल-भूत विचार को खोजने की जरुरत
किसी भी समाज को एकता सूत्र में बांधने का अचूक माध्यम इष्ट देव (ईश्वर) हैं। कुछ मुट्ठीभर तथा कथित नास्तिकों को अपवाद मान सकते हैं लेकिन जीवन के अंतिम चरण में पृथ्वीलोक छोड़ने से पहले वे भी आस्तिक बन जाते हैं। हमारे देश को एकता सूत्र में पिरोने के लिए उस विचार की खोज की जरूरत है जो हर नागरिक के मूल-भूत विचार हैं। भारतीय संस्कृति में गंगा मैया, जिसमें जीवन काल में कम से कम एक डुबकी लगाकर अपने सभी पापों से मुक्ति प्राप्त करने की तीव्र इच्छा हर भारतीय को रहती है। धार्मिक विविधता के कारण यह सभी पर लागू नहीं होता है। मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जीवन चरित्र भारतीयों को एकता सूत्र में बांधने एवं आदर्श जीवन शैली जीने के लिए अचूक सशक्त माध्यम है। धार्मिक विविधता के कारण कुछ लोग इसके भी अपवाद हैं।
प्रेम है जीवन का मूलसूत्र
कबीर दास ने कहा था पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित हुआ न कोय। ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय। यही जीवन का मूलसूत्र है। प्रेम परिवार, समाज, वर्ग एवं राष्ट्र को एकता सूत्र में बांधने का अचूक माध्यम है। दुर्भाग्यवश आधुनिकता की दौड़ में स्वार्थ पूर्ति तक ही आजकल प्रेम का अस्तित्व दिखता है।(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के मऊ के अध्यक्ष हैं।)



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