जेएनयू प्रकरण : भाजपा का यह कैसा चरित्र?

20 Feb 2016

जेएनयू मामले में कार्रवाई करने वाली केंद्र की भाजपा सरकार को अपने दोहरे चरित्र की भी स्थिति देश के सामने स्पष्ट करनी चाहिए। आतंकी अफजल गुरु को जिस पीडीपी ने प्रस्ताव पारित कर शहीद का दर्जा दिया हो, उसके नेतृत्व में कश्मीर में सरकार बनाकर आखिर भाजपा क्या सन्देश देना चाहती है, इसका जवाब उसे देश को देना होगा।

राजीव राय
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देश की राजधानी में स्थित प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे लगाने को लेकर समूचे भारत में बहस का दौर जारी है। चाहे दिल्ली यूनिवर्सिटी हो या जाधवपुर, देश के किसी भी कोने में भारत विरोधी नारे लगाने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। इस पर कोई बहस होनी भी नहीं चाहिए, लेकिन जब इन तत्वों के खिलाफ कार्रवाई में भी राजनीति होने लगे तो देश को अपूरणीय क्षति पहुंचती है। एक तरफ जहां जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया के खिलाफ देश विरोधी भाषण का वीडियो नहीं मिलने के बावजूद देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तारी हो चुकी है, वहीं जिनके खिलाफ सबूत है वे अब तक फरार हैं। संभवतः हिंदुस्तान ही एक ऐसा देश है, जहां देशद्रोही, गद्दार और आतंकवाद के आरोपी भी प्रमुख टीवी चैनलों पर आकर बहस करते हैं। चैनल वाले अपनी टीआरपी के लिए उन्हें बुलाते भी हैं। मेरा मानना है चाहे कश्मीर में पाकिस्तानी झंडे दिखाने वाले हों या विश्वविद्यालयो में देश विरोधी नारे लगाने वाले, यह मूलतः प्रचार पाना चाहते हैं। इन्हें मुफ्त में चैनलों के माध्यम से पब्लिसिटी मिल भी जाती है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि चैनल इस तरह के वीडियो को प्रसारित करने की बजाय पुलिस और सेना को दे दें? ऐसा होने लगा तो यकीन मानिये इनकी आधी हरकतों पर काबू पाया जा सकता है। मीडिया के साथियों से अनुरोध है कि मेरे इस सुझाव पर गौर करें, क्योंकि देश रहेगा तभी चैनल रहेंगे। हमने देखा है ताज हमले के दौरान टीआरपी के चक्कर में लाइव दिखाने के चलते ही हमारे बहुत से बहादुर नौजवान मारे गए। जेएनयू प्रकरण में कुछ प्रमुख चैनलों ने कन्हैया द्वारा भुखमरी, सामंतवाद आदि से आजादी के लिए लगाए जा रहे नारे को अधूरा दिखाकर देशद्रोह से जोड़ने का प्रयास किया, यह गैर जिम्मेदाराना रवैया नहीं तो और क्या कहा जाएगा? ऐसा भी नहीं कि देश की जनता बहुत दिनों तक अंधेरे में रही। कुछ पल बाद ही कन्हैया की नारेबाजी का सही वीडियो सोशल मीडिया व कुछ चैनलों के माध्यम से देश के सामने आ गया। उधर दूसरे पहलू पर गौर करें तो इस मामले में केंद्र सरकार और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कन्हैया की गिरफ्तारी कराने में जो जल्दीबाजी दिखाई, वह इस पूरे मामले का राजनीतिकरण करने वाला रहा। अदालत में कन्हैया की जमानत का विरोध नहीं करने और इससे पहले पुख्ता सबूत होने का पुलिस कमिश्नर बस्सी के बयान से भाजपा की मंशा सामने आ गई। चूंकि कन्हैया के ऊपर देशद्रोह का आरोप है जो गैर जमानती है। पुलिस कमिश्नर का जमानत का विरोध न करने का बयान या तो झूठ को छिपाने वाला है या वह मजाक कर रहे हैं। अगर सच में उनके पास सबूत है तो सिर्फ पुलिस ही नहीं बल्कि हम सब, पूरा देश उसकी जमानत का विरोध करेगा। देशद्रोही का विरोध न करना भी अपराध है। अगर वह देशद्रोही नहीं है तो पुलिस कमिश्नर को माफी मांगनी चाहिए। देश सच जानना चाहेगा। हमारा हिंदुस्तान कभी देशद्रोह बर्दाश्त नहीं करेगा। अफजल गुरु आतंकवादी था। उसके पक्ष में नारे लगाने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। जेएनयू मामले में कार्रवाई करने वाली केंद्र की भाजपा सरकार को अपने दोहरे चरित्र की भी स्थिति देश के सामने स्पष्ट करनी चाहिए। आतंकी अफजल गुरु को जिस पीडीपी ने प्रस्ताव पारित कर शहीद का दर्जा दिया हो, उसके नेतृत्व में कश्मीर में सरकार बनाकर आखिर भाजपा क्या सन्देश देना चाहती है, इसका जवाब उसे देश को देना होगा। हमारी मांग है कि यदि कन्हैया के खिलाफ कोई सबूत नहीं है तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाय और देश के गद्दारों के खिलाफ बिना भेदभाव के कार्रवाई हो।
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव हैं।)



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